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Sunday, 12 August 2012

मौत



भूख
रुदन
आह
कराह
आँसू
बेबशी लाचारी और मौत
के बीच  खोजता हूँ
कुछ कविता जैसी
मुलायम सी कोइ मरहम
कुछ नही मिलता मुझकों
हो जाता मैं खाली हाथ
पुस्तकालयॊं की रेकों
पर पडी मिलती है
बेसुमार कवितायें
और
पुरस्कृत कवि
क्या करुं मै इनका ।

1 comment:

  1. .

    बेशुमार कविताएं
    और
    पुरस्कृत कवि…
    क्या करुं मै इनका ?!


    कविता के नाम पर जो उबाऊपन परोसा जा रहा है, उस पर अच्छा कटाक्ष किया है आपने शिव शम्भु शर्मा जी !

    शायद आपके ब्लॉग तक पहली बार पहुंचा हूं …
    अच्छा लगा यहां आ'कर …

    कुछ पुरानी पोस्ट्स भी देखी …

    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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