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Monday, 14 January 2013

एक महादेश !


 बख्श दीजिये अब  मुझे ॥ (एक सरफ़िरे की पुरानी फ़टी डायरी का एक अधूरा पन्ना ,)
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किसे ढूँढ रहे है आप -- जनाब ? क्या कहा देश ! कौन सा देश ?
किसका देश ?
कैसा देश ?

नक्शें में ?
किताबों में ?
रैलियों में ?
भाषणों में ?
यहाँ ,..? या अरे,.. कही भी जाइये ,..आपके खोजने से यह नही मिलेगा

अजी किताबों से बाहर निकल जाइये
कायदे से
इत्मीनान से
दूर तलक जरा  टहल घूम आइये
रेशम के प्युपें के अंदर न देखिये
जरा बाहर भी झाकिये
चश्मा उतार कर नजर से नजारा देख आइये
तब मुझसे बतियाइये

कहां थे अब तक ?
कहां तक पढे हो ?
किस कालेज के सडें हो ?
अजी ! घसियारें हो कि चरवाहें हो ?
कि किसी भटकती आत्मा की  कराहें हो ?
क्या आपको ये मालूम नही अबतक  ?

क्या कहा नाज है ?...
जनाब ! काहे का कैसा नाज है ?
कान खोल कर सुन लीजिये
अजी  ! यह देश कभी था ही नही
और ! ना आज है
यही  बात तो राज है
क्या अब भी आपको नाज  है  ?

अजी यह देश था ही नही  ,.. न आज है... यह एक महादेश था और आज भी है
जी हाँ !  चक्रवर्ती राजे रजवाडों शाहो शहंशाहों  नवाबों नफ़ीसों मालिकों मुख्तारों
फ़िरंगियों और उनके ही अनु वंशजो का
भूखे नंगे जुआडियों भिखारियों  साधुओं फ़कीरों सपेरों कायरों भगोडों का
डूबता उतराता तैरता एक विशाल जहाज सा भूखण्ड
एक महादेश !
एक महादेश !
जिसमें
कई देश केवल अपनी-अपनी सरहदों की रखवाली करते है
आज भी
आपस में लडते मरते कटते पिटतें
अपने अपने देश में मगन रहते
एक दुसरे की डाह से कहकहें उडाते
केवल अपना मतलब साधतें

यकीन नही है -- आपको ? तो न सही , इसमें अपना क्या जाता है ?
राज तो बता दिया मुफ़्त में , अब अहसान मानिये या न मानिये

यही बहुत कर दिया --अब तसरीफ़ ले जाइये
हमे फ़िलासफ़ी का फ़लसफ़ा और जुगराफ़िया न समझाइये
रास्ता नापिये अब अपना घर संभालिये

जाइये
जाहिलों गंवारों वहशी दरिन्दों मवेशियों को
अपने  देश की कागजी राष्ट्रीयता का ज्ञान सिखाइये या पढाइये
और
बख्श दीजिये अब  मुझे

नारें लगाइये भटकिये मार खाइये जहन्नुम मे जाइये या भाड में,....
अपना झंडा अपने कांधे पर उठाइये
यहाँ से चलते बनिये
अपनी बला से ।
----------------श्श्श ।

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