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Friday, 25 January 2013

अकेला नही


जो देखता हूं
जो गुजारती है मुझपर
लिख देता हूं
वह मेरी रूचियां है मात्र
मेरी पसंद है केवल
मेरे रिक्त और तिक्त मन के तरंगों की
हिलोरों की
थपथपाहट है
जो  मुझसे टकराकर
ठहर जाती है मेरे पास
मुझसे बातें करती है
और कई दिनों तक
अनुगुंज बन कर मेरे साथ रहती है
मेरे स्वयं के संग एक परिधान पहन  कर
मै अकेला नही होता कभी

यह कतई जरूरी नही है कि मेरी रूचियां औरों को भी पसंद आए
मै किसी प्रशंसा वाहवाही या प्रोत्साहन की प्रत्याशा से नही लिखता
स्वयं को ही फ़टने से बचाने के लिये वह मेरा एक प्रयास मात्र  भर होता है
मै कोई कवि नही हूं जो लिखता हूं वह मुझे स्वयं भी पता नही होता
कि वह क्या है ?
और यह जानना भी जरूरी अब भी नही समझता
चाहता हूं बस अपने बीते क्षणों को कैद करना
कि जब चाहे उन्हे देख सकूं दुबारा
और याद रख सकूं
जी सकूं एक संपूर्ण मृदु शांत जीवन
--शोक संताप से रहित ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

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