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Saturday, 16 February 2013

एक समय मर रहा है


आलोचक जब भी कविता लिखते है
संभल कर लिखते है

उनका
बनावटी
सजावटी पन

फ़िसल जाता है तब
बूढे साहित्यविदों
की पैनी पुरानी पड चुकी चश्में के नजर की धार से

एक समय मर रहा है
कभी नही लौटने के लिये

मुझे अब भी  इंतजार है
उनके बोलने का
जो सवाल नही करते
मुस्कुराकर चुप रहते है ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

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