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Tuesday, 5 March 2013

कविता


जिन्दा रहने की जद्दोजहद में
इतना समय कहाँ है
कि पढी जाए कोइ कहानी

उपन्यास की तो सोच भी नही सकता
किस्तों में इतना बांट लिया है
हमने खुद को ही

अमूमन हर रोज एक जिन्दा कहानी
धारावहिक उपन्यास की सांस लेती किस्तें

चीखते छटपटाते और मरते
आदमी को अनायास देख लेता हूं

गलियों  चौराहों नुक्कडों बाजारों पर
भीख मांगते बच्चें स्त्रियां बूढों को
रिरियाते आदमी को
मुंह छिपाती  औरतें और
फ़िकरे बाज मनचले निठल्लों को

अब कहां कहां
क्या-क्या बताउं ?

क्या- क्या है या नही है  क्या होना चहिये क्या नही
यह   तय नही कर पाता
अपनी आंखे बंद भी कर लूं
तो कान का क्या करूं

और क्या करूं उस मन का
जो वह विवश कर  देता है सोचने को

बस किसी तरह पढ लिख लेता हूं कोई कविता
यही बहुत है
इसमे ही समय कम लगता है
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

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