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Sunday, 17 March 2013

’मैं ’


मुझे चिढाता  रहता
यह कितना बडा उथलापन है या
कोई कुंठा अवसाद या मानसिक दिवालियापन है
अपना दुख औरो से कहते फ़िरते रहना
आखिर कौन सी समस्या के किस समाधान के लिये ?

क्या मेरी घुटन कम हो जायेगी ?
क्लांत मन निर्मल पोखर सा शांत हो जाएगा ?
आंखों का यह गीलापन खत्म हो जाएगा ?
अगर ऎसा होना होता तो फ़िर कोई  बात ही नही थी
मगर ऎसा होता कहाँ है ?

माना ऎसा हो भी जाए तब भी
मेरे लिये ही इतना जरूरी क्यो हो जाता है यह ?
यह बताने के बदले चुप क्यो नही रह सकता मै ?

यह सच है यह दुख बडा सालता  है
तभी तो यह मौन मुखर हो जाता है
शब्द अनायास फ़ुटने लगते है बेतरतीब

मेरे जैसे ना जाने कितने लोग अपना दुख किसी को नही बताते
निज विवेक से ही अपनी राह बनाते
दुसरो को प्रकाश दिखाते चलते है
फ़िर मेरे लिये ऎसा क्यो नही हो पाता ?
क्यो मेरा आत्मविश्वास दगा दे जाता है
क्यो निज विश्वास ही साथ छोड जाता है  मेरा ?

क्यो छिछोरा अहं आ जाता है सामने
यह निगोडा अहं बहुत जरूरी अंग है क्या ?
सरसों सी राई को तिल का ताड बनाता ?
मैं ऎसे क्यो जीता चला जा रहा हूं ?
वह कौन है जो मुझे अपने अधिकार से जीने नही देता
वंचित करता जाता रहता है

अपने अस्तित्व पर चढ बैठा शायद वही  ’मैं ’  हूं
इसी अबूझ ’ मैं ’ को जानना बाकी रह गया है
जिसे जानना सबसे पहले जरूरी था मेरे लिये
शायद यही है मानव का वह चेतन तंतु
जिसमे सब छुपा है
सब का सब
पुरा का पुरा
पृथ्वी और असीम ब्रह्मांण्ड का वह सच भी
जिसकी मुझे तलाश है
बेसब्री से ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

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