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Saturday, 6 April 2013

ईश्वर


एक
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मेरे झोपडे में  धूप नही चढती
चांद के छत पर उतरनें का सवाल ही नही उठता

बगल में एक बजबजाता नाला बहता है
जो शहर और स्लम के बीच की सीमा रेखा बांटता है
जिसका नक्शा थानें में टंगा है
फ़र्श सर्द है
रात को  बंसहट खाट पर  एक मुर्दा लेटता है
जिसके मजदूरी दुख दर्द और प्रेम का अर्थ छोडिये
जिन्दगी और मौत का भी कोई लालपीला कार्ड नही होता

दो
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भिखारियों के इस मुहल्लें में
अल्सुबह पुरा कुनबा कई मंदिरों  की सीढियां अगोरनें चले जाते है
जैसे मजूर जाते है सडक पर गिट्टियां जमाने कोलतार बिछाने
और शाम को अपने साथ ईश्वर लिये लौटते है और उसे आग में झोक कर
जी जाते है फ़िर अगली सुबह के लिये

तीन
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नुक्कड पर एक पंडित बैठता है पिंजरे में तोता लिये
जब कोई जजमान फ़ंसता है तब पंडित का चेहरा किलक जाता है
तोते का चमक जाता है
और कथा--कला सुनने   मैं वहां ठमक जाता हूं
पंडित  उसे डराकर सपने और टोटकें का ईश्वर बेचता  है
और जजमान का ईश्वर बडे सलीके से साफ़ कर देता है
और इस तरह एक कहानी पढनें की मेरी साध पुरी हो जाती है

चार
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ऎसा नही है कि इस मुहल्ले में कविता नही आती
आती है अपने सर पर  बासी साग भाजी तरकारियों की टोकरी लिये
शाम के बखत
ये फ़टेहाल लोग तरकारियों से ज्यादा उस कविता को देखते है
जो औने पौने दाम में उनकी रोटियां नमकीन कर जाती है
पाँच
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मेरे झोपडॆ के सामने के एक झोपडे में एक बुढियां भिखारन
गोल कटी हुई खाट पर रोज अपना अंतिम दिन गिनती है
उसके पास मैं कुछ देर के लिये जाता हूं
वह मुझे बुलाकर बांचती है
हर रोज एक उपन्यास की धारवाहिक किस्त
छ:
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सुना है आज शहर के
पक्के मकानों के महल वाले  एक हाँल में बडे कवियों का सम्मेलन होने वाला है
इच्छा तो है कि वहाँ जाऊं
पर खाना खुद न बनाउं तो इतने पैसे कहाँ है कि नुक्कड पर खाऊं
और यह निगोडी देह जो टूट रही है दिन भर की जानलेवा मजूरी के दर्द से
अगर मै रात में सोऊं नही तो कल काम पर कैसे जाऊंगा
मेरा ईश्वर वह ठेकेदार भगा देगा तो क्या खाऊंगा
रहने दो भाई यह सब बडे लोगो की चीज है
हम जैसों के लिये नही ।
-------------------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

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