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Monday, 19 August 2013

लोहे के लगाम

लोहे के लगाम
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लो अब ये पुरस्कार वाले
ब्लाँगरों तक पहुँच गए
अब यहाँ भी
लोहे के लगाम होगें
घुडदौडें  होगीं

लाल फ़ुनगी लगाए घोडें
हिनहिनाएगें
प्रतिस्पर्धा की अंधी होड में
सरपट ऎड लगाए
यहाँ भी उंची छलागें होगीं
एक शोर होगा गर्द और गुबार होगा

और इस हंगामें में  कविता की
वह चमौटी गिर जाएगी
हमेशा की तरह

और फ़िर
निर्लोभ  निर्लिप्त  निष्कलुष
स्वतंत्र शांत वृक्ष
एकबार फ़िर आहें भर कर
देखते रह जाएगे
खडे
सडक किनारे ।
------------------------शिवशंभु शर्मा ।

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