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Monday, 7 October 2013

बहुत कुछ छूट जाता है


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शहर में बसते है हर बरस गाँव आते है
कार से छुट्टियाँ मनाने
उनकी कलम लिखती है -कविता

गाँव की सोंधी माटी की  लिखी जाती है सुगन्ध
उनका सफ़ेद कागज हरे रंग में बदल जाता है
उनका जन्म सावन के महीने में हुआ था
उनका कुरता प्रेम के विरह में गीला हो जाता है

और उनसे
छूट जाता है बरसात में बजबजाते
बँसवारी में फ़ैले मल की सडान्ध

छूट जाता है खाट पर पडे बीमार बूढे पिता
को ढोते चार दलितों की दुलकियाँ चाल
वे नही देख पाते
गाँव से सदर अस्पताल तक  की फ़िसलती
करईल माटी की कीच भरी फ़िसलन
पैसे के बगैर मौत पर फ़फ़कती किस्मतें
दहाडे मारती गरीब गुरबां औरते

उनसे छूट जाता है वह भिखुआ चमार
जिसकी बेटी के
गोईठा पाथने से मना करने पर
खंभे से बाँध कर जिसे पीटता है परधान

उनसे छूट जाता है बडकवन के टोले के मनचले
शोहदो का दलितों के घरों में घुसना

उनसे छूट जाता है
नान्ह के छोटे से खेत के डंरार को तोडकर
अपने खेत मे मिलाकर हडपना
गरजते हुए बडकवन का लऊर दिखाना बंदूक तानते
बात बात पर गरियाते
उनके गोतिये

बहुत कुछ छूट जाता है उनसे उनकी कविता में
वे कवि है अफ़सर है

अनाज लेकर जाते है
और छोड जाते है हमारे लिये थोथा ।
--------शिव शम्भु शर्मा ।




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