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Saturday, 6 December 2014

रोज-रोज


मैं रोज-रोज नही लिख सकता
क्योंकि लिखना मेरा कोइ शगल नही है
और न  पेशा
न तो कोइ शौक है न ही कोई मजबूरी

न तो किसीसे किसी तरह का कोइ अनुरोध है
न ही किसी किताब में छपने की चाह

यह तो महज
बस  उस अल्लहड पन सा है
जो बह उठती है कभी- कभी
उन हवाओ के  झोकों  की तरह
बिल्कुल अनमने से

 बगैर किसी
अनुनय-विनय अथवा प्रतीक्षा के

और इस बात से भी बेखबर
शीतल कर दे किसी को
अथवा खुश्क ।
------------------श्श्श।

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