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Friday, 30 January 2015

१.
बहुत दिन हुए
चुप हुए
बहुत दिन हुए
जिए
चुपाई को जीना कैसे कहें
कैसे कहे मौन को जीवन

बहुत दिन हुए मुस्काए
बहुत दिन हुए
तुम्हें आए ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।
२.
बिल्ली की तरह दबे पांव
जैसे आती है रात

बिल्कुल उसी तरह
आती है मौत
लील जाती है सब कुछ

बिल्कुल उसी तरह
जैसे शिकार निगल कर
गर्दन उठा लेता है मगरमच्छ
लौट जाता है नदी मे गुलाटी मारकर
शांत सा दीखता है नदी का तट

बिल्कुल पहले की तरह
जैसे कुछ था ही नही कभी
कोई जीवन
कोई नामोंनिशान ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।


३.
सोचा नही था
कभी ऎसा भी होगा

वह जिसके अंधेरे को
हमने ही वरण किया था
आंखें मींचकर

और एक रात वही आएगा
अंधेरे में
अंधेरा बनकर

लौट कर कभी
नही जाने के लिए ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।

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