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Saturday, 17 August 2013

गधे को गधे ही गधा कहते है |

गधे को गधे ही गधा कहते है
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गधे को गधे ही गधा कहते है
ये गधे नही देख पाते

गधे का हथियार
उसकी दुलत्ति का
वह प्रचण्ड वार

उसका अल्मस्त
बिन्दास कर्मठ जीवन
बिना किसी शिकवे शिकायत के
उसका मस्ती में बेपरवाह रेंकना

जो अमूमन नसीब नही होता
सभी को
ये गधे नही समझ पाते
अच्छे भले को गधा कहकर
झूम उठते है

अपनी नासमझी का या फ़िर
कुंठायी समझी का ठींकरा

इस बेचारे के सर पर
फ़ोड कर
बेचारे बेचारो पर हँसकर
चिढकर
अपनी भडास मिटाते है
गधा
कहते है ।
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।



Wednesday, 7 August 2013

नुमाइश

कविता
कविता न होकर
जब एक लत बन जाए

हर बात पर कविता
हर चीत पर कविता

पान बीडी सिगरेट तम्बाकु शराब
जैसे छुतहर व्यसनों की तरह

धुँआ उडाती
सडकों गलियारों कोनों में थूकती

उस पाजी रोग की तरह
जो  छूटने का नाम ही न ले

कविता
जब मात्र अपने नाम कमाने का जरिया
पुरस्कार पाने का  लालच
और मात्र आत्म प्रदर्शन का प्रपंच बनकर
एक बाजारू नचनियां की नुमाइश भर बन कर रह जाए

किसी इन्डस्ट्री का एक उत्पाद
बाजार में  बिकने की प्रतिस्पर्धा के कीमत की मुहर में बदल जाए
और
बंद हो  जाए चोरों मुनाफ़ाखोरों के गोदामों में
अनाजों से भरी लेबल लगी बोरियों की तरह
तब
उसका बहिष्कार कर देना एकदम उचित है
और
उसका नष्ट हो जाना तो सर्वथा उचित है ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Sunday, 2 June 2013

इन्हें बुरा ना कहो


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इन्ही दिनों कटे होते  है खेत
इन्ही दिनों चुभती है खेतो की खुटियाँ
इन्ही दिनों बजते हैं बाजें तासे शहनाईयाँ
इन्ही दिनों विदा होती है गाँवों की बेटियाँ

इन्ही दिनों नंगा होता है पर्वत
इन्ही दिनों पिघलती है बर्फ़
नदियों में बचा रहता है पानी

इन्ही दिनों धरती और सूरज होते है करीब
इन्ही दिनों तपता है समंदर
सूखते है पोखर झील ताल तलैया
और कुओं की तलहटी में बहुत कम रह जाता है पानी

ये पसीने के दिन बुरे नही है
इन आमों के दिनो को बुरा ना कहो

इन्ही दिनों बनते है बादल
इन्ही दिनों की बदौलत धरती होती है हरी--भरी
इन्ही दिनों की एवज में झूमते हैं किसान
गाते हैं मजूर
मंडियों में आते है अनाज
और गरीबों के बच्चें जाते है स्कुल

इन्हें बुरा ना कहो
इन्ही दिनो जगती है नई उम्मीदे
एक और बरस भरपेट जी लेने की ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 28 May 2013

वजूद



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सच ने हिम्मत जुटाकर
फ़िर एक बार सीना ताना
नथुनें फ़ुलाये
डट गया ईमानदार
होकर निडर

यह सोच कर
कोई हो ना हो
रहे ना रहे
उसका वजूद रहेगा हमेशा

सैकडों कैकडों  के डंक
के संग
जहरीलें बिच्छुओं के चौतरफ़े दंश
झेल न पाया

गिर पडा लाश बन
तमाशबीनों के बीच

खकियायें कुत्ते उसे सुंघते रहे
जब तक न हुआ पुरा पंचनामा

आँखो पर काली पट्टी बाँधे
कानून की देवी के तराजू के दोनो पल्ले
बराबर थे

दूर कही से रोनें की घुटी-घुटी
मद्धिम आवाजें आ रही थी

और
मूँछे ऎठते  हुए झूठ
तनकर खडा था
सीना ताने
उसी तरह
नथुनें फ़ुलाये ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 22 May 2013

रक्तबीज

प्रशंसा
एक भूख है
एक लोभ है
एक लत है
एक नशा है
एक रोग है
लग जाने पर जल्दी नही छूटता
छूटने के बहुत कम आसार होते है
रक्तबीज की तरह ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 19 May 2013

क्षुद्र अहं

क्षुद्र अहं
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किस-किस से कहाँ-कहाँ बहस करता फ़िरुं
अपनी बात पर अडिग रहकर
ऊँचा बोलकर
अपनी विद्वता के सही होने का
सबूत जुटाता रहुं

क्यो ?
किसके लिये ?
क्या उस क्षुद्र अहं के लिये

जो विशाल विस्तृत अंतहीन समय में
घडी की सुईयों की गति तक समझने में
असक्षम है
क्या उसके लिये ?
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 16 May 2013

अंतर

रोज है दिखती
घूरे  के कुडे के ढेर पर
बक-बक करती
वह पगली
उसमें और मुझमें सबसे बडा यही अंतर है
मैं  कह सकता हूं उसे
--पगली ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।