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Thursday, 11 September 2014

कट्टर

कट्टर
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कट्टर किसी भी धर्म का हो
संप्रदाय का हो
पार्टी का हो
किसी कुनबें या गिरोह का हो
या साहित्यिक विचार-धारा के किसी संगठन का हो

कट्टर सिर्फ़ और सिर्फ़ कट्टर होता है
और कुछ नही

जो कुछ वह समझता है
बस वही सत्य  है

बैठ जाता है अपने सत्य पर
ढीठ--परुआ बैल की तरह
राह में
खेत में

अब उसे कितना भी मारों
पीटों
या काट ही दो उसे
वह उठेगा नही

बेहतर है उससे बचना
हमेशा के लिये
हर हाल में,. ।
------------------------श श शर्मा ।

Wednesday, 10 September 2014

ईश्वर

नदियां सिर्फ़ नदियां है
बहती हुई कई सदियां है

इन्हें किसी की भी सभ्यता से कोई वास्ता नही होता
इन्होनें कभी नही बुलाया  आदमी को कि ,.. आ मेरे पास
और बसाले अपनी सभ्यता

ये तो खुदगर्ज आदमी हैं
जिसने  उन्हें पूजकर
ईश्वर तक बनाया
इसके किनारे अपना घर बसाया

और जब नदी उफ़नकर लीलने लगती है --आदमी
तब इतना शोर क्यों
इतना चित्कार कैसा ?

सदियों से इन्ही के भरोसे क्यो रहे ?
इन्हें पूजने के बजाय

मकडजालों में
तुम बाँध भी तो सकते थे इसके किनारे
लोहें और कंक्रीट क्या नही थे
तुम्हारे पास ?
-----------------श श शर्मा ।



Sunday, 12 January 2014

इसमे बुरा क्या है ?

इन दिनो
हवा कुछ ऎसी चली है
कि लोगो को पहचान पाना
मुश्किल नही है

ऎसे मे कोई मुझे भी पहचान ले
तो इसमे बुरा क्या है ?
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 10 January 2014

किसी के खूंटें से

खुटों से बंधे लोग
और
खुंटो से बंधे मवेशियो के बीच
जब कोई अंतर नही रह जाता

तब मायुस होकर देखने लगता हूं आसमान
जिसके परछाई का नीला रंग सोख कर
चलता रहता है समुद्र
अनवरत

यह देख कर थोडा सुकुन मिल जाता है
थोडा सुस्ता लेता हूं
अंजुरी भर समुद्र का खारा जल
देखकर थोडा जी लेता हूं
जिसका रंग मेरे आंसुओं से मेल खाता है

और फ़िर गुम हो जाता हूं
हजारो चेहरों की भीड में पैठकर
खोजता रहता हुं
कुछ नायाब सोच के चेहरें

वैसी आँखें
जो जल और आंसुओं के बीच के रंग का समझते हो
अंतर
और जो किसी ऎठे हुए पगहें के सहारे बंधे नही हो
किसी के खूंटें से ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 12 December 2013

वह लेस्बियन है या गे


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अब प्रेम की कविता देखते ही
चौक जाता हूं

कविता से नही
प्रेम से भी नही

उसके रचयिता से डरने लगा हूं

पता नही क्या निकले
प्रेम तो प्रेम है
पर प्रेम है किसका ?

वह लेस्बियन है या गे
यह जानना बेहद जरूरी हो गया है

क्योकि
कविता बडी नही होती कभी
कविता से कवि बडा होता है
हमेशा ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

मीडियां


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हमें मीडियां हांकता है
हर रोज
सुबह से शाम तक

मवेशियो की तरह

एक दुसरे के चारागाह में चरते
दौडते रंभाते
हांफ़ते रहते है
हम
और शाम होते ही कुतरने लग जाते हैं

अपने हिस्से के सबसे
बडी खबर का समय
चुहों की तरह

यह जानते हुए भी कि मीडियां को कौन हांकता है ?
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 6 December 2013

देह



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रूप और वासना के बीच
ही अक्सर
कहीं छुपा रहता है - प्रेम

कभी किताबों का रूप धरकर
बिकता है बाजारो में

कभी मौत की खबर बनकर
छा जाता है समाचारो में

अलग-अलग रूप धरकर
सजकर संवरकर
आता रहेगा
प्रेम

कोई रोक नही सकता किसी भी तरह
इसका आना

और तब तक यह आता रहेगा
जब तक कि पृथ्वी पर
जीवित रहेगी देह ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।