वह
रोज बोता है
रोज काटता है
झूठी तसल्लियाँ चाटता है
और भूख से छटपटाता है जब
उसका शब्द पत्थर हो जाता है
हम शब्द नही बोतें
वाह वाहियों पर नही जीते
पसीनें बोतें
हम किसान है
हमे फ़ख्र हैं
हमारी फ़सल से तुम्हारा पेट चलता है
और तुम्हारी कलम चलती है॥
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।
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