आलोचक जब भी कविता लिखते है
संभल कर लिखते है
उनका
बनावटी
सजावटी पन
फ़िसल जाता है तब
बूढे साहित्यविदों
की पैनी पुरानी पड चुकी चश्में के नजर की धार से
एक समय मर रहा है
कभी नही लौटने के लिये
मुझे अब भी इंतजार है
उनके बोलने का
जो सवाल नही करते
मुस्कुराकर चुप रहते है ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।
No comments:
Post a Comment