स्वागत है आपका ।

Wednesday, 24 September 2014

प्रशंसा !

प्रशंसा !
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प्रदर्शन ! प्रदर्शन और सिर्फ़ प्रदर्शन
इसके सिवा
और कुछ नही ?
और कुछ नही ?

क्यो ?
ऎसा क्यो ??
ऎसा क्यो ??

प्रशंसा ! प्रशंसा ! प्रशंसा
यही चाहिये उसे बस यही और यही
चाहिये उसे सिर्फ़ यही

पर क्यो ?
पर क्यो ?

वो इसलिए कि वह जानवर नही है अब
आदमी है  ! आदमी है !

और आदमी का मतलब समझ लो
सिर्फ़ प्रशंसा !
प्रशंसा ! प्रशंसा ! प्रशंसा !

इसके सिवा और कुछ भी नही !
-----------------श श शर्मा ।

Monday, 22 September 2014

संवेदना से संबधित नही है।

संवेदना से संबधित नही  है।
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दर्शन भुगोल खगोल इतिहास विज्ञान  - वगैरह -वगैरह -वगैरह -वगैरह जैसे विषयों का संबंध
अगर आदमी से नही तो किससे है ?

कौन जानता समझता हैं इन्हें
कौन पढता लिखता गुनता बुनता हैं इन्हें

अब आदमी के नही तो फ़िर किसके मस्तिष्क की स्नायविक-उतकों की उर्जा से
संचारित होता है यह ?

बडा अजीब सा दायरा बनाया हुआ है  वह भी इसी आदमी का ही है
और कहते हो कि  यह कविता नही है दर्शन है भूगोल है फ़लां है ढकां है
यह जीवन से संबंधित नही है संवेदना से संबधित नही  है

कविता  को तुम किसी भी परिभाषा और परिसीमाऒं  में बाँध नही सकते हो !

मित्र ! कविता भील की आंखों में भी होती है
हाँ उसके पास वे शब्द और वह भाषा नही है जो तुम्हारे पास है
इसका मतलब यह नही कि उसके पास कविता नही है

यह अलग बात है कि तुम उसकी आँखों मे छुपी कविता पढ नही सकते
तुम नही समझ सकते उसे वो इसलिये कि तुम एक दायरे मे विश्वास करते हो
तुम जो समझते हो या जो तुम्हें अब तक समझाया गया है बस वही तुम समझ सकते हो

आसमान की असीम उचाईयों और झील की अतल गहरी गहराईयों  में
और उससे परें दुर-दुर तक फ़ैले नीरव में जहाँ तुम कभी नही पहुंच सकते
वहाँ भी कविता हो सकती है
इसे किसी नियत दायरों में बांधने की मुझे जरूरत नही महसूस होती
आगे तुम्हरी मरजी ।
----------------------------------श श श.।









Sunday, 21 September 2014

फ़र्क

आज से नही
सदियों से  भिखारी हैं
चुंकि भीख मांगना अपने देश की एक संस्कृति है
और परंपरा भी

एक व्यवस्था भिखारी बनाता है
एक व्यवस्था भीख देती है

किसी को
भीख माँगते देख किसे अच्छा लगता है भला ?
भिखारन अगर  वृद्ध विधवा महिला हो तो और भी अच्छा नही लगता

अच्छा तो मुझे भी नही लगता
वरन कोफ़्फ़त होती है ऎसी दुर्दशा देखकर
पर कहुं तो कहुं आखिर किससे ?

अगर यही बात  कोई प्रसिद्ध /सांसद /महिला / अभिनेत्री कह दे
तो फ़िर क्या बात है ?
लोग टूट पडते हैं उस पर
सवाल करते है उसके महिला होने पर
अपने तरकश के बुझें तीर कमान निकाल कर

जैसे अब न बोलेगी दुबारा कभी वह
और मान लेते है
जैसे खत्म हो जाएगी यह भीख मांगने की परंपरा


और यही बात
कोई मुझ  अदना सा फ़िसड्डी आदमी कहे
तो कहता रहे अपनी बला से

सोचता हूं कितना  फ़र्क होता है
एक प्रसिद्ध और
एक गुमनाम के बीच ।
------------------------------श श 

Friday, 19 September 2014

वे मित्र जो संघ अथवा वामपंथ के कट्टर प्रचारक है कृपया मुझे अमित्र करके राहत दे


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मुझे  संघ और वाम पंथियों में कोई खास फ़र्क नजर नही आता ।
ये दोनो के दोनो  एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं
मेरे लिए
जितने मक्कार उतने ही खूंखार भी

इसलिये नही कि मैं इन दोनो को पढा नही
जाना समझा या परखा नही

जानता हूं इन दोनो को इनकी बेहतरीन खूबियो के साथ
इनके  फ़लते फ़ूलते कुनबे और गिरोह के संख्याबल साथ

मुझे याद आता है केरल
जहाँ लगभग प्रतिवर्ष घात लगाए ये  दोनो के दोनो खेलते हैं  एक दुसरे के खून की होली
जिनके खत्म होने के आसार लगभग नही है
भगवा धारी भी कही कम नही हैं



मैं अक्सर देखता हूं  उन बुढ्ढे बेहद पढे लिखे वामपंथियो को जिनके पाँव कब्र मे लटके है और वे वमन कर रहे है -विष लगातार फ़ैला रहे हैं रायता

कभी कविता कभी कहानी कभी लेखकीय कसीदाकारी और अपनी खास टीप कर कर के

अभिव्यक्ति के अधिकार का मतलब क्या यही होता है ?

मुझे शक होता है अब इनकी नस्लों पर जो महान कवि लेखक आलोचक और पता नही क्या-क्या है
और इनमें  विरोधाभास भी ऎसा कि  ये अपने नाम का महत्वपूर्ण  ’ हिन्दु ’ शब्द तक भी आज तक नही बदल पाए
मुझे शक होता है इनसे कोई देश कैसे बदल सकता है

जिन्हे बरतना चाहिये था एहतियात
जिन्हे रखना चाहिये था खयाल वर्तमान व आनेवाली नयी पीढियों के भविष्य का
जिन्हे याद रखना चाहिये था अपने अधमरे /गरीब/ भिखारी/ विकाशील/ दीमक लगे लंगडे देश का

और बोलनी चाहिये थी एक सुलझे हुए आदमी की भाषा
जहाँ वे बोल रहे है लगातार जहर उगलने की भाषा

और जिनपर फ़ख्र होना चाहिये था हमें  उन्हे देख कर अब आती है घिन

कट्टर होना देश हित में बुरा है
गुण और दोष सभी मे होते है जरूरत है पशुता / कट्टरता से बाहर निकलने की
क्या इतनी भी समझ नही है इन्हें
फ़िर किस बात के सिद्धांतवादी है ।
----------------------------------------अनावृत

Wednesday, 17 September 2014

कविता और अकेलापन ---एक डायरी

कविता और अकेलापन ---एक डायरी
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जितनी साफ़गोई से
वह लोकधर्मी मंचीय कवि अपनी बात कह गया

मैं समझ सकता हूं

ठीक उतनी ही सफ़ाई से चौरसियां जी भी फ़ेर लेते है
चिकने मगहियां पान पर अपने हाथ

पाँच का पान पंन्द्रह में खिला कर

मुदा बात कुछ ऎसी तो नही लगती कि
कविता में आत्मा आत्मा से बात करती है

अगर ऎसा है तो यह दुसरी आत्मा   है कौन ?
क्या एक आदमी की दो आत्माएं हो सकती है ?
नही न !
तब फ़िर वह किससे बाते करता है
यह दुसरी आत्मा  है किसकी ?

पान के सफ़ेद चूने की तरह साफ़ है कि
यह दुसरी आत्मा पाठक की है

तो इसका सीधा मतलब यह कि कवि अपनी आत्मा के अलावा
पाठकों की आत्मा के लिये भी लिखता है

पाठकों की उपस्थिति के आभास में
प्रतीक बिम्ब भाषिक मजबूती चित्र जोडने और
कविता को छपने लायक बनाए रखने का ध्यान भी रखता है

उससें प्राप्त होने वाले धन  या नही तो  किसी न किसी प्रशंसा यश की
कोई न कोई प्रत्याशा सुक्ष्म अथवा सुक्ष्मतर रूप मे ही सही
उसके साथ जुडी तो अवश्य ही रहती होगी
ऎसे में
फ़िर कविता गढते समय कवि अंतत: अकेला कैसे हुआ ?

मुदा अपनी पीडा या अपने अकेलेपन के लिये तो वह डायरी--वायरी भी तो लिख सकता है
अभिव्यक्ति अव्यक्त को तृप्ति ही तो चाहिये न !
और क्या ,...?

इतना तो डायरी से भी तो चल सकता है
आखिर ऎसी क्या जरूरत है उसे इतने छंद अलंकार काट छाट और बनियाँदम नाप तौल करने की  ?
प्रकाशकों के दरवाजों पर दौड-दौड कर दस्तक देने की

अब मेरे होंठ लाल हो चुके है पान की पीक से मुंह भर आया है
मैं उस जगह की तलाश मे हुं
जहाँ थूक कर हो सकूं--हल्का ।
----------------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 12 September 2014


वह सब
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जान बूझ कर
मैनें अंधेरें का रास्ता चुना

उल्लुओं चमगादडों से उनका पता पूछा
उनके घर देखे
उनके साथ जिया उनकी जिन्दगी
उनके जीने का अंदाज देखा

सच कहुं तो
रौशनी मे वह सब दिखायी नही देता
जो दीखता है
अंधेरें मे ।
--------------------शश ।


Thursday, 11 September 2014

कट्टर

कट्टर
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कट्टर किसी भी धर्म का हो
संप्रदाय का हो
पार्टी का हो
किसी कुनबें या गिरोह का हो
या साहित्यिक विचार-धारा के किसी संगठन का हो

कट्टर सिर्फ़ और सिर्फ़ कट्टर होता है
और कुछ नही

जो कुछ वह समझता है
बस वही सत्य  है

बैठ जाता है अपने सत्य पर
ढीठ--परुआ बैल की तरह
राह में
खेत में

अब उसे कितना भी मारों
पीटों
या काट ही दो उसे
वह उठेगा नही

बेहतर है उससे बचना
हमेशा के लिये
हर हाल में,. ।
------------------------श श शर्मा ।

Wednesday, 10 September 2014

ईश्वर

नदियां सिर्फ़ नदियां है
बहती हुई कई सदियां है

इन्हें किसी की भी सभ्यता से कोई वास्ता नही होता
इन्होनें कभी नही बुलाया  आदमी को कि ,.. आ मेरे पास
और बसाले अपनी सभ्यता

ये तो खुदगर्ज आदमी हैं
जिसने  उन्हें पूजकर
ईश्वर तक बनाया
इसके किनारे अपना घर बसाया

और जब नदी उफ़नकर लीलने लगती है --आदमी
तब इतना शोर क्यों
इतना चित्कार कैसा ?

सदियों से इन्ही के भरोसे क्यो रहे ?
इन्हें पूजने के बजाय

मकडजालों में
तुम बाँध भी तो सकते थे इसके किनारे
लोहें और कंक्रीट क्या नही थे
तुम्हारे पास ?
-----------------श श शर्मा ।