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Thursday, 29 November 2012

घबराना नही


जब कोई पसंद न करे आपको
अपने भी  साथ छोड जाय आपका
खुद की आंख के आंसू भी बहने से दगा दे जाय
किसी भयंकर विपदा और संकट की घडी मे भी
जब चारो ओर घटा टोप अंधेरा हो
अपना हाथ भी साथ देने से मना कर जाय

तब भी
दुखी होकर घबराना नही मेरे भाई
ये हालात एक आनेवाले वरदान का संकेत है
याद रखना
अंधेरी सूखी नदी के उस पार
कोई इंतजार कर रहा है तुन्हारा
खडा है --केवल तुम्हारे लिये
जिसके पास हैं ---एक नया सवेरा ।

--श्श्श

डेंगु का ज्वर


अब लगभग नही सुनाई देता कही से
मुक्ति दुष्यंत शमशेर धूमिल बाबा अदम जैसों का स्वर

समृद्ध हो गये गये है कितने हम अब
भूख से मरता  नही कोई अब
अनाजो से भरे पडे है गोदाम
भीख नही मांगता कोई बच्चा अब
नही बीनता घूरे से कचरा कबाड अब
नही लुटती है अब किसी गरीब की अस्मत

अब नही सुनाई देता कही से वह जनवादी स्वर
कितने खुशहाल है हम अब
पता नही कहाँ से आ गया यह डेंगु का ज्वर
 ------------------श्श्श

Tuesday, 27 November 2012

अहिर्निश समुद्र ।


समुद्र तट पर
अबोध बच्चें
और उन्ही की तरह के लोग
मुफ़्त के बेशुमार बिखरे  रेत पर
उछलते कूदते खेलते
बनाते हैं
सपनों के अपने-अपने धरौदें

रेत मुफ़्त की नही होती
कई बडे पत्थर अपना सीना तोडकर चुकाते रहते है मूल्य
लगातार लुढकते टूटते और बिखरते रहे है सदियों से
संग-संग  बहते जाते है नदियों से
तब बनते हैं रेत ---समुद्र जानता है

एक बडी लहर आती है
सारे घरौदे समेट ले जाती है

बच्चे कहां समझ पाते है ? लहरों का आमंत्रण !
और जारी रहता है यही खेल

कैमरा लटकाये घुमते
कुछ बच्चे अपनी उम्र से पहले ही सयानें हो चले है
अपने बनायें घरौदों का खीच लेते हैं तश्वीर

लिख देते है उन पर अपना नाम और पता
और लगा देते है एकस्व स्वामित्व की मुहर

नाम तश्वीर से बडा  होता है
कही भूल-चूक न हो जाय
इसलिये पता भी होता है

इन बेशुमार तश्वीरो की किताब के  नाम का एक बाज़ार है
जहां दुबारा छापी जाती है तश्वीरें
कीमतें लगायी जाती है
होता है मूल्यांकन
और बाँटे जाते है पुरस्कार

नाम की निगोडी यह लालच ही कराती है चोरियां
टूटती हैं तिजोरियां
चोरों के घर भी होती है चोरियां

इन तश्वीरों से भरी जाती है बोरियां
सील मुहरबंद लाह से जिसके मुँह पर
लिखा होता है --काँपी राइट एक्ट के अधीन सुरक्षित

मुफ़्त की हवा पानी खा पीकर
महज एक शक्ल देने की एवज में
नाम की इतनी बडी कवायद मे कही कोई अर्थ बचता है क्या ?
नाम से बडा कुछ नही होता क्या ?

देखता इस व्यापार में डूबते उतराते
कृतध्न मनुष्य को
और ठठा कर  हंसता हैं ---अहिर्निश समुद्र ।

Monday, 26 November 2012

सच बोलना ,,


इतिहास भूगोल गणित विज्ञान वगैरा वगैरा
क्या तुमने लिखा था ?
चलना फ़िरना लिखना पढना कमाने लायक बने तुम
क्या तुमने खुद से सीखा था ?
सच बोलना ,,,
आज एक दोयम दर्जे की भाषा में
कविता लिखकर कहते हो कि मेरी है
कितने बेशर्म हो तुम ?
सच बोलना ,,,
इस पुरी कायनात को लिखने वाला तुमसे कब कहने आया
कि यह मेरी है ?
शर्म नही आती तुमको स्वयं को कवि कहते ...
सच बोलना ?


ये हाइकू क्या है ?


एक सच
----
मैने एक जापानी से पूछा
----ये हाइकू क्या है ?
----और इतना छोटा क्यो है ?
जापानी ने बताया--
हमारे देश मे काम करना सबसे उपर है
लफ़्फ़ाजी का नंबर सबसे नीचे है
---लंबी कविता लिखने में
और उसके पढे जाने मे
बहुमूल्य समय बरबाद न हो -इसलिये हाइकू है ।
---श्श्श ।

समुद्र तट पर



**********************

एक लडकी रूठती है
एक लडका मनाता है
फ़िर
लडका रूठता है
अब लडकी मनाती है

उन्हें देखकर एक कवि  अपनी कविता साधनें
रोज-रोज तट पर  आता है
प्रेम के बीच की बारीकियों को
टांकता है--- कागज पर
अपने शोध का विषय बनाकर
सोचता है
वह प्रेम के एक नये अंश का काव्य लिख रहा है

सदियों से जारी यह खेल कोइ नया नही है
और इसपर इतना कुछ  लिखा जा चुका है
कि और कुछ भी लिखने की गुंजाइश नही है
---------गंभीर समुद्र यह जानता है

अन्जान कवि  कविता में अपनी प्रेयसी को निहारता है
और समुद्र --अपने तट को

---ये दोनो नही मानते

न समुद्र मानता है
न कवि मानता है

-------उपर खडा चांद मुस्कुराता है
--वह दोनो को जानता है ।
-----------श.श.श..

Saturday, 24 November 2012

दुर्गंध


मच्छी बाजार की सडांध का भभूका
नथूनें को सिकोड देता है
मजबूर करता है
रूमाल रखने के लिये
अन्यथा हटने के लिये

शोंर भरें बाज़ार में
भूख से जूझते  अभ्यस्त लोग
नही हटते दुर्गंध सें

रोजगार मे छिपा भूख ही तो
हाकें लगाता
मोल करता

तराजू बाट लिये बैठा रहता
तौलता है भूख को भूख
किलो के भाव से
और बदल देता है
दुर्गंध को एक लजीज
सुगंधित व्यंजन की खूशबु में

Friday, 23 November 2012

लत


लत कैसी भी हो
लानत है
अच्छी भी हो सकती है
और बुरी भी
उन्हे देखने का जज्बा
उन्हे मोडने का कब्जा
अगर हमारे हाथ में हो

नही हो सकते हम किसी लत के शिकार

Saturday, 17 November 2012

मुफ़लिसों से भरें वतन में


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ऎसा नही है
कि दशहरें में रावण को पहली बार जलाया
हर बरस ऎसा ही होता है
रावण मरेगा नही कभी
रावण अमर है

ऎसा यह भी नही है
कि दिवाली में दीप पहली बार जलाया
हर बरस ऎसा ही होता है
अंधकार मिटेगा नही कभी
अंधेरा अजर है

फ़िर क्यों नही समझते गरीब देश के लोग
भ्रष्टाचार के बाद इस देश के
त्यौहार दुसरे बडे अजगर है
क्यों बाते करते हो आकाश की उजाले की और बे मरम्मत घर है


स्फ़ुर्ति ताजगी के लिये तो काफ़ी एक अवसर है
दिखाना ही है तो दिखाओ किसी दुसरे अमीर देश को
अपनों के बीच अपने को ही दिखाना क्या यही शेष भर है ?

त्यौहार सादगी से भी मनाये जा सकते है
अरबों खरबों जलाने से बचाये जा सकते है
कोई परंपरा नष्ट नही होगी आखिर किस बात का डर है ?

बहुत हुआ रहम करो अब कही ऎसा न कहे कोई
के मुफ़लिसों से भरें वतन में खाली डब्बों के सर है ।
------------------श्श्श

Friday, 9 November 2012

ओ चंचला !


तुम्हारा प्रेम भी
अहसान जताने के दायरे की
एक छोटी सी डीबियां में बंद है

बिल्कुल उस दान की तरह
जिसे किसी मंदिर के प्राचीर पर
संगमरमर में
कैद करवाता है  दाता
अपना नाम

नाम के फ़ेर मे तुम नही जान पाओगी

उन लोगो को जो चुप रहकर
करते रहते है - प्रेम
बिना जताये किसी को बताये
किसी  गुप्तदान  की तरह
निर्बन्ध

ओ चंचला !
तुम नही समझ पाओगी
चुप्पियों के हृदय में छुपे
उस उन्मुक्त प्रेम को
नाम की कैद से परे
उस श्रम को जो
देखता है
समझता है
दया और करुणा के
बीच का अंतर ।
---------श्श्श..!

Tuesday, 6 November 2012

आईना


झूठों की लम्बी कतार में
वाह वाही के सिवा
जो नही सुन सकते
सच
आलोचना
और
निचोड
अपनी रचना के विरुद्ध

जरूरी नही सभी आईने
समतल दर्पण  हो
उत्तल
अवतल भी हो सकते है

जो नही देखते आईना
जीते तो वे भी है
फ़िर जरूरत क्या रही होगी
कुछ रचने की  ??

Sunday, 4 November 2012

दवा


माँ अब उंचा सुनती
बिस्तर पर सिकुडी
रहती
खांसती भी है

खंखार से बहुयें होती
अब खूंखार

बहुओ को खांसी की
दवा पता है
किसकी बारी है आज
जरूरी यह  है ।