स्वागत है आपका ।

Thursday, 12 December 2013

वह लेस्बियन है या गे


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अब प्रेम की कविता देखते ही
चौक जाता हूं

कविता से नही
प्रेम से भी नही

उसके रचयिता से डरने लगा हूं

पता नही क्या निकले
प्रेम तो प्रेम है
पर प्रेम है किसका ?

वह लेस्बियन है या गे
यह जानना बेहद जरूरी हो गया है

क्योकि
कविता बडी नही होती कभी
कविता से कवि बडा होता है
हमेशा ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

मीडियां


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हमें मीडियां हांकता है
हर रोज
सुबह से शाम तक

मवेशियो की तरह

एक दुसरे के चारागाह में चरते
दौडते रंभाते
हांफ़ते रहते है
हम
और शाम होते ही कुतरने लग जाते हैं

अपने हिस्से के सबसे
बडी खबर का समय
चुहों की तरह

यह जानते हुए भी कि मीडियां को कौन हांकता है ?
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 6 December 2013

देह



*******
रूप और वासना के बीच
ही अक्सर
कहीं छुपा रहता है - प्रेम

कभी किताबों का रूप धरकर
बिकता है बाजारो में

कभी मौत की खबर बनकर
छा जाता है समाचारो में

अलग-अलग रूप धरकर
सजकर संवरकर
आता रहेगा
प्रेम

कोई रोक नही सकता किसी भी तरह
इसका आना

और तब तक यह आता रहेगा
जब तक कि पृथ्वी पर
जीवित रहेगी देह ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

Monday, 25 November 2013

अतीत


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मेरे रूकने  से कोई सडक नही  रूकती
और न सवारियां
करती है मेरा इंतजार

अपनी सीट जब्त करने से फ़ुर्सत कहाँ किसी को
कि  कोई क्षण भर  भी सोचे
मुझको

मै वही अतीत हूँ
जिसे पिछली रात यही हत्यारिन सडक निगल गई थी
मेरा लहू पोछ कर
और संवरकर
खडी है आज फ़िर से हसीन बनकर

यही दुनियाँ है और यही सडक है
हम नही है पर वही तडक- भडक है ।
------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 13 November 2013

सही में


*******************
कोई किसी को याद नही करता
बस एक रस्म निभाई जाती है

तोते की तरह रटते
नल पर बैठते लोग
किसी को याद नही करते

अपने लाल होठों की नुमाइश करते है
जहाँ हर रोज
पर्दे पर एक -एक चेहरा आता है

वहाँ  किसी को याद करने का बोलो
आखिर क्या मतलब रह जाता है ?
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 27 October 2013

विनम्र अनुरोध


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अब कवियों से
और कविताओं से डर लगने लगा है

पढने से पहले यह पता लगाना बेहद जरूरी है
कि कवि किस पार्टी का गुमाश्ता है

प्रकाशकों से यह विनम्र अनुरोध है

कृपया साहित्य की पुस्तकों के उपर
उनकी पहचान के तौर पर

उनकी राजनीतिक पार्टी का नाम बडे मोटे अक्षरों में
अनिवार्य रूप से  छपवा  दे

हम अपने मेहनत के पैसे और बहुमूल्य समय खर्च करते है
अब इतना तो हक  बनता ही है हमारा ।
-------------------------------एक पाठक ।


Thursday, 24 October 2013

अमूर्त यात्रा ।

अमूर्त यात्रा ।
***************
वे लोग जो प्रशंसा ख्याति नही चाहते
अपनी दुकान नही लगाते
गुप्तदान कर जाते हैं

दया और करूणा के बीच का यह अंतर
वे नही समझ पाते कभी

जिनके नाम और पते खुदे होते है
संगेमरमर के आयतों में

और चस्पाये जाते है मंदिरों अस्पतालों
अनाथालयो की दीवारो पर

परिभाषाओं की परीधियों में कैद
अनजान
नही लांघ पाते कभी वह दीवार जिसके बाद ही
शुरू होती है जीवन की अथाह
अमूर्त यात्रा ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Wednesday, 23 October 2013

चापलुसी


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जनाब ईमानदार है
सृजन कर रहे है
यानी
अपना मकान स्वयं बना रहे है
बहुमुखी प्रखर प्रतिभा कुशाग्रबुद्धि की मति के धनी है

इनकी रचनात्मकता
रचनाधर्मिता उत्कृष्ट है
और इस सहगुणधर्मिता के एकलौते वारीश केवल जनाब है

इन्ही के सृजन की बदौलत कायम है अब तक की स्थापत्य कला
और देखो
दूर से दीख रही है जो
वह धवल ईमारत
जनाब की उपलब्धियो का एक दृष्टांत मात्र है

आओ इनसे दीक्षा ले
और करे
इनकों नमन ।
(कारीगरों मजदूरों का इसमे कही कोई जिक्र नही होता )
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

चाँद

सजधज कर वह चाँद को देर रात गये निहार रही थी
चाँद का कही पता नही था
जब चाँद निकला
तब खिलखिला कर हँस रहा था
अपने सगे के मनुहार पर
और
आदमी के आदमी होने के व्यापार पर ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 22 October 2013

सिफ़ारिश


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चापलुसों से भरा पडा है
हिन्दी साहित्य
सोचता हूँ इतना बुरा हाल क्यो है ?
कोई किताब ऎसी क्यो नही मिलती
जिसके पहले या आखिरी पन्ने पर
चापलुसी पसरी न हो ?

कितना विवश है साहित्य का यह जीव
बहुत बुरा लगता है मुझे ऎसी चापलुसी से

इस घिनौनी लाग लपेट की
लोलुपता भरी  सिफ़ारिश से
उस बौनी समझ से जिससे पाठको को उकसाया जाता है
वह भी महज एक किताब खरीदने के लिये

क्या सचमुच बिना सिफ़ारिश के इस देश मे कुछ किया नही जा सकता ?
अगर ऎसा है तो लानत है
इस विधा को ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 7 October 2013

बहुत कुछ छूट जाता है


********************
शहर में बसते है हर बरस गाँव आते है
कार से छुट्टियाँ मनाने
उनकी कलम लिखती है -कविता

गाँव की सोंधी माटी की  लिखी जाती है सुगन्ध
उनका सफ़ेद कागज हरे रंग में बदल जाता है
उनका जन्म सावन के महीने में हुआ था
उनका कुरता प्रेम के विरह में गीला हो जाता है

और उनसे
छूट जाता है बरसात में बजबजाते
बँसवारी में फ़ैले मल की सडान्ध

छूट जाता है खाट पर पडे बीमार बूढे पिता
को ढोते चार दलितों की दुलकियाँ चाल
वे नही देख पाते
गाँव से सदर अस्पताल तक  की फ़िसलती
करईल माटी की कीच भरी फ़िसलन
पैसे के बगैर मौत पर फ़फ़कती किस्मतें
दहाडे मारती गरीब गुरबां औरते

उनसे छूट जाता है वह भिखुआ चमार
जिसकी बेटी के
गोईठा पाथने से मना करने पर
खंभे से बाँध कर जिसे पीटता है परधान

उनसे छूट जाता है बडकवन के टोले के मनचले
शोहदो का दलितों के घरों में घुसना

उनसे छूट जाता है
नान्ह के छोटे से खेत के डंरार को तोडकर
अपने खेत मे मिलाकर हडपना
गरजते हुए बडकवन का लऊर दिखाना बंदूक तानते
बात बात पर गरियाते
उनके गोतिये

बहुत कुछ छूट जाता है उनसे उनकी कविता में
वे कवि है अफ़सर है

अनाज लेकर जाते है
और छोड जाते है हमारे लिये थोथा ।
--------शिव शम्भु शर्मा ।




Sunday, 6 October 2013

पुनर्जन्म


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ओ हिन्दी के कमजोर ! मरियल फ़िसड्डीयों
कक्षा में सबसे पिछली बैंच पर बैठने वाले
सडी गली हड्डियों !

आज के हिन्दी के  पुरोधा बने कवियों !
पुनर्जन्म की मिथक अवधारणा के पोषकों

कविता में चमत्कार उत्पन्न करने वालो !
झूठे मक्कारों ! मैं तुम लोगो से पूछता हूँ
और तुम्हें पुरस्कृत करने वाले तुम्हारी बिरादरी से पूछता हूँ

बताओ आत्मा अगर अमर है तो  वह कहाँ गई ?
किसके शरीरों में समाहित है ?

भगत सिंह
चंद्रशेखर
सुभाष
सुखदेव
खुदीराम
बिस्मिल
जैसे तमाम अमर शहीदो की आत्माये ?
आत्मा तो अमर है न ! तो फ़िर कहाँ है ?
बताओ ?

देश में रौदे जा रहे लोग
बेखौफ़ घूमते लुटेरे

हत्या लूट गरीबी भ्रष्टाचार भूखमरी बेरोजगारी
चोरबाजारी जैसी रोज-रोज की लानत भरी खबरें
क्या तुम्हे सुनाई नही देती ?
कि दिखायी नही देती ?

घिनौने कुकर्मियों  बलात्कारियो का बेखौफ़ घूमना
जेल से छूटना
निकम्मी सरकार की बेचारगी भरी ऎसी भिखमंगी अवस्था क्यो है ?
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।






मेरा वजूद


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इस घूमती दुनियाँ में चक्कर लगाते -लगाते
घूमते -घूमते
तुम्हारी कविता थककर जहाँ खत्म होती है
मेरे दोस्त !
ठीक वही से शुरु होती है मेरी कविता
और मेरे संग होता है मेरा अकेलापन

दूर दूर तक पसरा यह अंतहीन बियावान
निर्वातमय  अरण्य

न कोइ संगी न साथी
और न कोई ईश्वर

जहाँ अकेला भटकता रहता हूँ मैं
उस अर्थ की खोज के तहों में
जहाँ निरूत्तर हो जाता है समय
और बंद हो जाती है घडी

सामने होता है वही सन्नाटा
वही घनघोर असीम अंधेरा
जहाँ दौलत शोहरत किस्मत जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नही होता

मेरे पास बस मेरी
प्रकृति प्रद्त्त चेतना है
प्रेम है
जो तुम्हारे पास भी है

वही रह--रह कर सालती है
साथ-साथ चलती है
और जानती है मेरा होने के वजूद का अर्थ
और इसीलिये बार-बार लिखकर
जान बूझ कर
मिटा कर फ़ेंक देती है
मेरे होने का सबूत ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 5 October 2013

प्रेम

सुनो ! हे कविवर ! हे महात्मन !
सुनो !
कभी आत्मा के अस्तित्व के विरूद्ध मत लिखना
ईश्वर
धर्म
संप्रदाय
जात और
रूढियों के विरूद्ध तो कतई नही लिखना
भूल कर भी
वर्ना इस देश से निकाले जाने की संभावनायें  बढ सकती है
या बेमौत मारे जा सकते हो

हे मानव श्रेष्ठ !
अगर लिखना है तो प्रेम पर लिखो
सुरा सुन्दरी और सुराहीदार गर्दन पर लिखो
उस प्रेम पर लिखो
जिसमे प्रेमी युगल आलिंगनबद्ध होने की बाट जोहते है
जिसमे प्रतीक्षा विरह अश्रु और मिलन की बात होती है
इश्क और सूफ़ियानों की मर्दानी जात होती है

हे ! विद्वन !
यही वह सरल पथ है
वह सरल भाषा है
जिसका अर्थ जलचर नभचर और उभयचर सभी समझते है

हे ज्ञान चक्षुवर !
यही वह गलियाँ है जो उन महलों के किलों तक पहुचती है
जहाँ राजे महाराजे विराजते है
और बाँटते है मोहरें रेवडियाँ

और इस तरह लोकप्रियता की झडियाँ लग जायेगीं
फ़िर आपकी लिखी किताब तो क्या
एक मामूली तश्वीर भी खरीदे जाने के लिये मारामारी होगी
हे अधिष्ठाता ! सुनो !
सदियो से
यह देश ऎसा ही है ।
----------------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Friday, 4 October 2013

मै लिखकर मिटा देता हूं

मै लिखकर मिटा देता हूं
संजोकर रखना नही चाहता

अकेला हूं
रेत पर
रोज देखता हूं
आती जाती लहरो को
लिखे हुए हर्फ़ो के हश्रों  को

न भी मिटाउँ
तब भी ये खुद ब खुद मिट जायेंगी
मुझे लहरों का सहयोग भी नही चाहिये ।
-----शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 3 October 2013

मौलिक हक


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आजादी के पहले से ही
इस देश में योजनाओ की कई नदियाँ बहती है
कही नरेगा कही मनरेगा कही कुष्टरोग निवारण

तो कही बाढ आपदा नियंत्रण नदी
कही पशुओ के चारे की नदी
आदि-आदि

नहाकर धोकर ड्र्म में भर कर लगभग सभी ले जाते है
यही तो  लोक तंत्र का मौलिक हक है

लालु जी नए थे और गरीब तबके से आते थे
सो हहुआना वाजिब  था
नदी में मोटा पाईप लगवा बैठे
और सारा पानी अपने घर ले गए
नदी सूख गई
खबर बन गई
गलती बस यही हुई

वैसे अरबपति तो हो गए
बहुत नाम भी कमाया

और देखिये ये जेल वेल से क्या होता है ?
तेरह साल गुजर गया
आपने देखा ही
और आप यह भी देखेगें
जनाब बाहर निकलेगे
उपरी अदालत की कृपा बरसेगी
फ़िर आठ दस बरस निकल जाएगा
बेचारी नदी फ़िर बहेगी ।
------------------------शिव शम्भु शर्मा ।


’ जात ’


***********
कभी कभार
जब  जाता हूं गाँव
तब यकीन मानो
पर लग जाते है
जमीन पर नही होते है-पांव
पहचान वाले  पूछते है- हाल
अपने खेत खलिहान बधार जवार से
मिलकर
तब  हरा हो जाता  है मन
और चौडी हो जाती है छाती

कई जो मुझे नही जानते
आपस में कानाफ़ुसी से
पूछते है मेरी  ’ जात ’

और दबंग मुझसे मेरे पिताजी नाम पूछते है
जैसे टटोल लेना चाहते हो मेरी  ’ जात ’

और यहीं से निश्चित हो जाता है
उनके व्यवहार की श्रेणी

मेरे रहने से
नही रहने से
कितनी बडी चीज है मेरी
’ जात ’ ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।



Wednesday, 2 October 2013

मुझे पता है


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कल मौकाए दस्तूर था
नेता जी आए
गाधी पर कुछ बोलना था
सो बोल गए
तालियां बजी
लड्डू बटे
लोग घर गए
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आज धर्मनिरपेक्षता पर गरज रहे है
कौमी एकता पर बरस रहे है
************
मुझे पता है जनाब
बिना मुहूर्त के कोई शुभ काम नही करते
रोजे मे इफ़्तारी खाने गले मिलने जाते है
किन्तु अपनी
बराबरी के अपने ही सहयोगी अल्पसंख्यक के बेटे से अपनी बेटी
की शादी  की बात सोच तक  भी नही सकते
*******************
मुझे पता है
इस देश में
गांधी और धर्मनिपेक्षता का अर्थ ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 20 September 2013

शराब ।


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हत्या लूट
आये दिन बलात्कार
थमने का नाम नही ले रहे है
इनके तमाम वजहों में एक बेहद शातिर चीज
शामिल रहती है
जिसके कारोंबार पर सभी
चुप रहते है
सरकार भी
आवाम भी
अक्सर
और वह है --शराब ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 18 September 2013

पुरस्कार


**************
नामी गिरामी राजाओं महाराजाओं
दाताओं के द्वारा
भाट -दरबारी कवियों  लिखनीहारों नर्तकियों गवैयों
ढोलकियों मृदंगियों चित्रकारों मशखरों को

जी हुजुरी जयगान जयघोष श्रृंगार की एवज में
खुशी खुशी जो कुछ दिया जाता रहा है
उसे भीख न कहकर
ईनाम कहा जाता था
और कही -कही पुरस्कार

आज उसी पुराने पाक का संशोधित परिष्कृत रूप
पुरस्कार है
जो एक मुहर है
बाजार में बिकने की उत्कृष्टता के उंची कीमत का
प्रमाणपत्र है
जिसके लिये और जिस पर
सबसे पहले
 भिनभिनाती रहती है मक्खियाँ

सोचता हूं यह  पुराना घिनौना  खेल
अब तक खत्म क्यो नही हो जाता
साहित्य में ही सही कम से कम आ तो जाता
समाजवाद ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 13 September 2013

हिन्दी दिवस
***************
हिन्दी दिवस
दरअसल एक फ़ंड है
आँख लगाए बैठे रहते है, वे
जिन्हें अपनी भाषा पर
घमंड है
क्योकि इसी दिन भक्षण होता है
तृप्त होते है , वे
जो हिन्दी के प्रचंड है ।
-------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 27 August 2013

किसने बनाया ?

जिसने भगवान को बनाया
कहते हैं --
उसी ने
शैतान को भी बनाया

अब सवाल यह है
कि आखिर
इन दोनों को किसने बनाया ?
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 25 August 2013

कवि

तुम कवि हो तो हो
इसमे ऎसा क्या है ?

बाबर भी अपने जमाने का
एक बहुत बडा शायर था ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

मार्मिक कविताए


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उसने भूख पर मार्मिक कविता लिखी
अखबारों में पर्चे छपे
विद्वानों ने चर्चे जपे

और वह पुरस्कृत हो गई
बधाईयाँ मिठाईयाँ बांटी गई

चरमरायें से
कायरो के देश में कीचडों मे जन्में
लीचडों में पलें
मनचले शोहदों ने एक दिन उसे
अकेली पाकर
बलात्कार कर दिया

और
छोड दिया उसे जीवन भर
लिखने के लिये
मार्मिक कविताए ।
-------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Monday, 19 August 2013

लोहे के लगाम

लोहे के लगाम
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लो अब ये पुरस्कार वाले
ब्लाँगरों तक पहुँच गए
अब यहाँ भी
लोहे के लगाम होगें
घुडदौडें  होगीं

लाल फ़ुनगी लगाए घोडें
हिनहिनाएगें
प्रतिस्पर्धा की अंधी होड में
सरपट ऎड लगाए
यहाँ भी उंची छलागें होगीं
एक शोर होगा गर्द और गुबार होगा

और इस हंगामें में  कविता की
वह चमौटी गिर जाएगी
हमेशा की तरह

और फ़िर
निर्लोभ  निर्लिप्त  निष्कलुष
स्वतंत्र शांत वृक्ष
एकबार फ़िर आहें भर कर
देखते रह जाएगे
खडे
सडक किनारे ।
------------------------शिवशंभु शर्मा ।

Saturday, 17 August 2013

गधे को गधे ही गधा कहते है |

गधे को गधे ही गधा कहते है
*********************************
गधे को गधे ही गधा कहते है
ये गधे नही देख पाते

गधे का हथियार
उसकी दुलत्ति का
वह प्रचण्ड वार

उसका अल्मस्त
बिन्दास कर्मठ जीवन
बिना किसी शिकवे शिकायत के
उसका मस्ती में बेपरवाह रेंकना

जो अमूमन नसीब नही होता
सभी को
ये गधे नही समझ पाते
अच्छे भले को गधा कहकर
झूम उठते है

अपनी नासमझी का या फ़िर
कुंठायी समझी का ठींकरा

इस बेचारे के सर पर
फ़ोड कर
बेचारे बेचारो पर हँसकर
चिढकर
अपनी भडास मिटाते है
गधा
कहते है ।
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।



Wednesday, 7 August 2013

नुमाइश

कविता
कविता न होकर
जब एक लत बन जाए

हर बात पर कविता
हर चीत पर कविता

पान बीडी सिगरेट तम्बाकु शराब
जैसे छुतहर व्यसनों की तरह

धुँआ उडाती
सडकों गलियारों कोनों में थूकती

उस पाजी रोग की तरह
जो  छूटने का नाम ही न ले

कविता
जब मात्र अपने नाम कमाने का जरिया
पुरस्कार पाने का  लालच
और मात्र आत्म प्रदर्शन का प्रपंच बनकर
एक बाजारू नचनियां की नुमाइश भर बन कर रह जाए

किसी इन्डस्ट्री का एक उत्पाद
बाजार में  बिकने की प्रतिस्पर्धा के कीमत की मुहर में बदल जाए
और
बंद हो  जाए चोरों मुनाफ़ाखोरों के गोदामों में
अनाजों से भरी लेबल लगी बोरियों की तरह
तब
उसका बहिष्कार कर देना एकदम उचित है
और
उसका नष्ट हो जाना तो सर्वथा उचित है ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Sunday, 2 June 2013

इन्हें बुरा ना कहो


***************
इन्ही दिनों कटे होते  है खेत
इन्ही दिनों चुभती है खेतो की खुटियाँ
इन्ही दिनों बजते हैं बाजें तासे शहनाईयाँ
इन्ही दिनों विदा होती है गाँवों की बेटियाँ

इन्ही दिनों नंगा होता है पर्वत
इन्ही दिनों पिघलती है बर्फ़
नदियों में बचा रहता है पानी

इन्ही दिनों धरती और सूरज होते है करीब
इन्ही दिनों तपता है समंदर
सूखते है पोखर झील ताल तलैया
और कुओं की तलहटी में बहुत कम रह जाता है पानी

ये पसीने के दिन बुरे नही है
इन आमों के दिनो को बुरा ना कहो

इन्ही दिनों बनते है बादल
इन्ही दिनों की बदौलत धरती होती है हरी--भरी
इन्ही दिनों की एवज में झूमते हैं किसान
गाते हैं मजूर
मंडियों में आते है अनाज
और गरीबों के बच्चें जाते है स्कुल

इन्हें बुरा ना कहो
इन्ही दिनो जगती है नई उम्मीदे
एक और बरस भरपेट जी लेने की ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 28 May 2013

वजूद



*************
सच ने हिम्मत जुटाकर
फ़िर एक बार सीना ताना
नथुनें फ़ुलाये
डट गया ईमानदार
होकर निडर

यह सोच कर
कोई हो ना हो
रहे ना रहे
उसका वजूद रहेगा हमेशा

सैकडों कैकडों  के डंक
के संग
जहरीलें बिच्छुओं के चौतरफ़े दंश
झेल न पाया

गिर पडा लाश बन
तमाशबीनों के बीच

खकियायें कुत्ते उसे सुंघते रहे
जब तक न हुआ पुरा पंचनामा

आँखो पर काली पट्टी बाँधे
कानून की देवी के तराजू के दोनो पल्ले
बराबर थे

दूर कही से रोनें की घुटी-घुटी
मद्धिम आवाजें आ रही थी

और
मूँछे ऎठते  हुए झूठ
तनकर खडा था
सीना ताने
उसी तरह
नथुनें फ़ुलाये ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 22 May 2013

रक्तबीज

प्रशंसा
एक भूख है
एक लोभ है
एक लत है
एक नशा है
एक रोग है
लग जाने पर जल्दी नही छूटता
छूटने के बहुत कम आसार होते है
रक्तबीज की तरह ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 19 May 2013

क्षुद्र अहं

क्षुद्र अहं
**************
किस-किस से कहाँ-कहाँ बहस करता फ़िरुं
अपनी बात पर अडिग रहकर
ऊँचा बोलकर
अपनी विद्वता के सही होने का
सबूत जुटाता रहुं

क्यो ?
किसके लिये ?
क्या उस क्षुद्र अहं के लिये

जो विशाल विस्तृत अंतहीन समय में
घडी की सुईयों की गति तक समझने में
असक्षम है
क्या उसके लिये ?
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 16 May 2013

अंतर

रोज है दिखती
घूरे  के कुडे के ढेर पर
बक-बक करती
वह पगली
उसमें और मुझमें सबसे बडा यही अंतर है
मैं  कह सकता हूं उसे
--पगली ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

दृष्टिदोष

दृष्टिदोष
**********
बडे आदमी का जेल जाना एक बहुत बडी खबर है
धाराप्रवाह दिखाई जाने लगती हैं लाईव- ब्राडकास्ट
जो वास्तव में एक भांड से ज्यादा कुछ नही होता

बहरकाल  इनकी छींक भी बडी खबर होती है
सक्रिय हो उठता है एक बडा वर्ग
खोजा जाने लगता है छींकनें का कारण
और चिकित्सकीय निदान
भेजे जाने लगते है मंगलाचरण पूर्ण शुभकामनायें
होने लगती है प्रार्थनाये
उघाडी जाने लगती है छीकने की रहस्य की परतें
छिड जाती है एक बहस

जबकि छोटे आदमी की निर्मम वीभत्स हत्या की खबर भी
कोई नही सुनता

ये लोग जो युगो-युगो से गुलाम रहे है
नही जा सकते अपनी परंपराओं  के विपरित
ये अपने आकाओं मालिको को खूब पहचानते है
माहिर है अपने फ़न में

आज भी है वही पुरानी चाटुकारिता और
कैद है
भेजों की झिल्लियों में पूर्वाग्रह

यही वह अंतर है
वह दृष्टिदोष है
जिससे बचे रह जाते है पूंजीपति और इनके
अनुषांगिक अनुगामी लोग
और धीरे--धीरे इसी तरह बेजान मुर्दो में तब्दील हो जाता है
--एक देश
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 15 May 2013

भीड


भीड
*************
ऎसी जगह खडा हूं
जहां खडे रहने धक्के खाने  के सिवा
कुछ भी किया नही जा सकता
धकियाना भी भीड के वश में  है

शोर इतना है कि किसी से कुछ कहा-सुना नही जाया जा सकता
बस बदहवास पागलों सा रहा जा सकता है

पानी में तैरती उस डगमगाती नाव की तरह
जिसमें न केवट होता है और  न पतवार
सामने होता है बस थपेडता अथाह जल

वहशी सांडों की तरह जान लेवा बेहया भीड  है
जहाँ तलवे रखने से ज्यादा नही बची होती है  जगह

यह धीरज का समय  है
यह कविता का समय नही है

यह चतुराई बहादुरी का समय है
यह धूर्तई और लूट का समय है

भीड भरी ट्रेन में जैसे एक अनारक्षित अदद सीट लूटनें का
महज कुछ घंटॊं के सुकुन के लिये मरने मारने का
डांटने डपटने छिनने झपटने का समय है
एक अघोषित अराजकता का समय है

भरे बोरों की तरह ट्रेन में लदने का समय है
जिसकी लदाई और यात्रा
दोनो तय करती है--  भीड ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 14 May 2013

भोर


गाँव मवेशियों के तबेले में तब्दील हो गए
अब वहाँ आदमी नही रहते
और शहर की सडक पर हाँफ़ता भागता  है
भगदड सरीखा तेज शोर
रोबोट यांत्रिक मशीनो की चहलकदमी है बस
आदमी मर चुका है
ठहर चुकी है भोर ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

हम


फ़िर वही दिन
वही रात
फ़िर वही तुम
वही हम
फ़िर वही फ़ुहारें
वही बिजली का तडकना
वही मौसम
कही कुछ कहाँ बदला ?
सब वैसे ही है
जैसे थे
अभी तक
टँगी हुई तस्वीरों सी
दीवारों में
ठहरी ठहरी
सहमी सहमी
आकुल
तुम्हारें आने की राह जोहती
प्रतीक्षारत ।
----शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 11 May 2013

स्वयं से ही ।


स्वयं से ही
*********
तुम निरंतर प्रेम प्रेम चिचियाते रहते हो
मै क्या करूं ? तुम्हारे इस अंधे प्रेम का

कभी चिडियां नदी पर्वत तो कभी फ़ूल तितली
और न जाने  क्या-क्या बनकर बनाकर
उलझे उलझाये  रहते हो

तुम क्या जानो इन बेशर्मो धूर्तो
मक्कारों जाहिलो कमीनों को

कठकरेजो और नौटंकीबाजों को
जो रहते है तुम्हारे ही गाँव में
तुम्हारें अपने बनकर
तुम्हें लुआठने

और तुम दूर  पलक पांवडॆ बिछाये रहते हो उनकी याद में
लिखते रहते हो कोइ कविता कहानी
झेलते रहते हो अपने हृदय के बिछोह की पीडा

और निकाल लेते हो इन्हे अपने सभ्य
साफ़ सुथरे प्रेममय शब्दों की चासनी में  डुबाकर
रख देते हो सफ़ेद  कागज पर
कर देते हो इस तरह सच्चाई का खून
मै क्या करूं ? तुम्हारे इस संगीन अपराध का

छपवा देते हो कोई किताब
परोस देते हो गन्दी गालियों को छुपाकर
उत्कृष्ट साहित्य के स्टाम्प में संजोकर
बेच देते हो  बाजार में लीप -पोतकर

जैसे बेच देता है कोई चालाक हलवाई अपनी बासी सडी मिठाइयों  को
केवडे गुलाबजल कें तीखे सेंट में डुबाकर
चाँदी की चमकदार  वर्क चढवाकर
खूबसूरत रंगीन डब्बे में तौलाकर

क्या करूं तुम्हारे इस अंधे प्रेम का
जो सच व्यक्त करना नही जानता
या  नही चाहता  
हतप्रभ हूं स्वयं से ही ।
 --------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 8 May 2013

आसमान


छोटे-छोटे दलों में बंटे बुद्धिजीवि भी
छोटे-छोटे प्रादेशिक राजनीतिक दलों की तरह है
परस्पर बिखरे हुए

कभी न सुखने वाले नासुर की तरह बहते हुए
अपने अहं महत्वाकांक्षा के विकार से संलिप्त

अपनी आगामी चौदह पीढियों के निबंधित सुख संसाधनो के जुगाड मे
तल्लीन
कार्यरत
निरंतर ध्यान साधना रत

गिद्ध की तरह आकाश में मंडराते हुए
नोचते रहते है अपना -अपना हिस्सा

बडे कायदे और मासुमियत भरे सलीके से
जिसे पालता है बडे शौक से वह आसमान
जो इस जमीन का होकर भी
इस देश का नही है ।
-------शिव शम्भु शर्मा ।

झल्लाहटें


झल्लाहटें कभी सही नही होती
किसी की भी
यह आपकी हो या हमारी
यही है जो बता जाती है अंदर की उस ईमारत का नक्शा
जिसमें  छुपा रहता है एक खंडहर
दृष्टिदोष युक्त आँखें जिसे देख नही पाती
देख नही पाती
वह खाली उलझा सा कमरा
वह झूठा दफ़न मकबरा
और वह मशवरा जो कतई जरूरी नही होता कभी
दुसरों के लिये
जितना कि जरूरी होता है
खुद के लिये ।
-----------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 30 April 2013

गड्ढा


कोई फ़रक नही पडता आपके हुजुम में
शामिल रहने या नही रहने से
मुझको

आपको तो मतलब है बस
केवल शहद से
भला मक्खियां आप क्यो निगले ?

आपकी नजरों मे  जो बात नही  है
वह भी यूं ही तो नही है
हमने ही आज तक वह आपको नही बताया है
लिहाज किया है हमने

केवल गड्ढा ही दीखता है आपको
और
गड्ढें के पास ही पडी
खोदी गयी मिट्टी की वह ढेरी
नही दीखती

जिसे अंधे भी ठोकरों से  देख लेते है
अब आपको वह न दिखे तो मैं भला क्या करूं ?
-----------शिव शम्भु शर्मा

मजदूर दिवस



*************
मेरे इलाके के दहाडी मजदूरो एक हो जाओं
आज तुम्हारा दिन है
मंच सज चुका है माइक वाला तैयार है

आज हमारा कामरेड आएगा
साथ में
कवि भाषनियां विद्वान समाजसेवी आएगा

आओ आज नारे लगाने है
ताली बजाना है
ईट से ईट बजा देना है
गद्दारो ठेकेदारो मालिको को दहला देना है

आओं
आज की मजदुरी के बदले
बुंदियां खाकर रस चाटकर  ड्राम का पानी पीना है
मगर इन पूंजी- पतियों को हिला देना है

नई सडक बनानी है नेशनल हाईवे का ठेकेदार आएगा
नई मशीने लाएगा पक्की सडक बनाएगा
काम लंबा चलेगा रोज चलेगा

आज जो नही आएगा उसका नाम रजिस्टर में नही चढेगा
और वह काम नही पाएगा
फ़िर उसे डेरी में मवेशियों का गोबर ढोना पडेगा
चारा काटना पडेगा
वह भी आधी मजदूरी में
सोच लो फ़ैसला कर लो
बाद में हमको दोष मत देना

देखो फ़िर से कहता हूं  कान खोल कर सुन लो

आज कामरेड आएगा
लालसलाम आएगा
वातानुकुलित बी एम डब्ल्यु कार से
उसके आते ही
तुम्हे फ़ूल छिडकना है माला पहनाना है

आओ आज सबको दिखा देना है
दुनियां के मजदूर एक है ।
--------------------श्श्श।

Monday, 29 April 2013

शिखण्डी कौन है ?


शिखण्डी कौन है ?
************************
डाक्टर तक पढा लिखा प्रोफ़ेसर
एक जमाने का गवर्नर
इतना सीधा साधा कि पूछो मत
ईमानदार
मासूम सा चेहरा
और केवल एक औरत का वफ़ादार ?

क्या वह वाकई शिखण्डी है ?
या यह शिक्षा प्रणाली शिखण्डी है
या हम
या फ़िर यह पुरा का पुरा देश
जो कायरों काहिलों जाहिलों लम्पटों
चरवाहो उपाधियों पदवियों  व्याधियों से
से अटा पडा है

जो आज तक
एक भाषा
एक देश
एक धर्म
एक ईश्वर
एक पूर्ण बहुमत की सरकार तक नही बना सकता

गठबंधन की दानवी लूट
सरेआम बलात्कार के बाद
मासूमो तक को जो नही बख्शते
अब चीन की बात कर रहे है

कुछ देशी लोग जो विदेशो में डेरा जमाए हुए है
हिन्दी साहित्य से जुडे है
उन्हें शर्म  आ रही है
जबकि मुझे घिन

असमंजस में हूं
सोचता हूं
कि वाकई आखिरकर शिखण्डी कौन है ?
और है तो क्यो है ?
------------------शिव शम्भु शर्मा ।




Sunday, 28 April 2013

बम्बू


उन्होनें कहा --
तुम बिम्ब विधान नही समझतें
साहित्य समझना तुम्हारे जैसो के वश का नही है

मैने कहा---
तुम भी ,.जो जैसा है उसे वैसा नही समझते
सच्चाई समझना तुम्हारे जैसो के वश का भी नही है

हम दोनो में फ़र्क बस इतना था

मैं बिम्ब नही समझता
और वह बम्बू नही,.....।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 27 April 2013

विकृति




*****************
सामाजिक मानसिक विकृति कोई
एक दिन में  नही आती
यह कोई तुफ़ान या जलजला नही है

इसे जन्म देता हैं हमारा ही समाज

विश्व के सबसे बडॆ लोकतंत्र बने रहने के पाखंड में अंधे
अपनी कायरता का भोजन और दब्बूपन का पानी
खिला-पिलाकर पालता है पोशता है बडा करता है

बना डालता है अपराधी
और  फ़ैला देता है छूत का एक लाईलाज कोढ

फ़िर यही समाज करने लगता है  हाहाकार चित्कार
जब होने लगता है बलात्कार दर बलात्कार

यह तब भी कोई ठोस कदम नही उठाता
जब पराकाष्ठा की हदें भी कर जाती हैं पार

मुट्ठी भर लोग आवाजे उठाते है आज
बाकी सब बस तमाशेबाज

गूंगें बोलते है अंधे लिखते है
और कुछ बहरें इसे सुनते है

ठीक वैसे ही जैसे
सुनी जाती  है
नक्कार खानें में तूती की आवाज ।
-------------------------शिव शम्भु शर्मा




*****************
सामाजिक मानसिक विकृति कोई
एक दिन में  नही आती
यह कोई तुफ़ान या जलजला नही है

इसे जन्म देता हैं हमारा ही समाज

विश्व के सबसे बडॆ लोकतंत्र बने रहने के पाखंड में अंधे
अपनी कायरता का भोजन और दब्बूपन का पानी
खिला-पिलाकर पालता है पोशता है बडा करता है

बना डालता है अपराधी
और  फ़ैला देता है छूत का एक लाईलाज कोढ

फ़िर यही समाज करने लगता है  हाहाकार चित्कार
जब होने लगता है बलात्कार दर बलात्कार

यह तब भी कोई ठोस कदम नही उठाता
जब पराकाष्ठा की हदें भी कर जाती हैं पार

मुट्ठी भर लोग आवाजे उठाते है आज
बाकी सब बस तमाशेबाज

गूंगें बोलते है अंधे लिखते है
और कुछ बहरें इसे सुनते है

ठीक वैसे ही जैसे
सुनी जाती  है
नक्कार खानें में तूती की आवाज ।
-------------------------शिव शम्भु शर्मा



Friday, 26 April 2013

शामियानें


गेहुं कटने के बाद का खेत
और पुरा का पुरा सरेह
डरावना सा लगने लगता है
सुनसान सा सिवान
तब कितना खुरदरा दीखता है

गांव से थोडी ही दूर
उदास से इन्ही खेतों में
लगते है तब  शामियानें
आकर टिकती है दूर से कोई बारात
गाजे बाजे के रस्मों रिवाजों के साथ

और विदा कराकर ले जाती है अपने साथ
अपनी सभ्यता का विस्तार

तब खुरदरा खेत और निचाट सा हो जाता है
देखा नही जाता इसे भी उन आसुओं की धार
हो जाता है यह भी तार तार

कोई नही देख पाता इसे
फ़ट जाता है यह भी उतने ही दुख से

और करता है फ़िर वही इंतजार हर साल की तरह
आषाढ की उन  चहल कदमियों  का
जिसमे  बोये जाते है फ़िर से नये बीज
एक बार फ़िर से कटने के लिये

ऎसा होता रहता है बार बार
जिस पर खेतों  का कोई अपना वश नही होता
गांव की बेटियों की तरह ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 25 April 2013

हम ही क्यो आंसु बहाए


बेगानी शादियों में दीवानें
इस देश में अबदुल्लें बहुत है

रोज चींखती है  यहां औरतें
इस देश में छल्लें बहुत हैं

रोज लुटती है यहां अस्मतें
इस देश में मुछल्लें बहुत हैं

रोज बिकती हैं  यहां बेबशें
इस देश में दल्लें बहुत हैं

हर साल घुस आता है चीन
इस देश में गुरिल्लें बहुत है

मंत्रियों को फ़ुर्सत कहां कि देखे
इस देश में लालुलल्लें बहुत हैं

रोज मरतें हैं यहां कई भूखें
इस देश में (अनाजों के) गल्लें बहुत हैं

लिखते रहें है लिखनेवाले लिखें
इस देश में चोरों के वल्ले-वल्ले बहुत है

खाने को रोटी नही न तन पर कपडें
इस देश में क्रिकेट कें निठल्ले बहुत है

हम ही क्यो आंसु बहाए और रोए

यारो चलो हम भी मस्त रहे
इस देश में रसगुल्लें बहुत है ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।



Tuesday, 23 April 2013

झूठ


झूठ रात-रात भर सिरहानें बैठकर
झूठे-झूठे सपने दिखाता रहता है

और सुबह जब  खुलती है पलकें
तभी आ धमकता है फ़िर

दिन भर साथ-साथ बोलने के लिये
जब तक कि पलकें बंद न हो जाए
पुरी तरह

मरने के बाद भी
पीछा नही छोडता

सच यही है
यह समय कुछ ऎसा ही है
कुछ किया नही जा सकता जिसका

समय जो ठहरा
बदला नही जा सकता
इसे
यह रहेगा
और बढ-चढ कर ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Saturday, 20 April 2013

मुंह लटकाए


सडक पर एक भीड उमडी चली आ रही है
नहर में फ़ाटक का पानी किसी ने छोडा हो जैसे

शोर तेज होती आ रही है
अब साफ़- साफ़ सुनाई दे रहा है

ठेले पर लदा माईक साथ-साथ  चलता है
झंडों के डंडे संभालें नौजवान
बैनरों में तैरते शब्द
सैकडों मुंहों के विविरों में लपलपाती जीभ
उगल रहे है
गर्म भाप बने शब्द उड जाते हैं

काफ़िला गुजर गया
एक शोर बिफ़र गया
एक जरूरी दस्तुर था जो निभा दिया गया
अब सब कुछ सामान्य है थिर है
जैसे कुछ हुआ ही नही है

नहर में कई बार इसी तरह छोडा जाता है पानी
अभ्यस्त  जानते है इस पानी की धार की पहुंच

कमजोरों गरीबों के सूखे परती खेत
धोखेबाज बादलों की आस में
हमेशा की तरह खडे  हैं
मुंह लटकाए ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 15 April 2013

बेवकुफ़ चुप रहो


न जाने क्यो मन कसैला है इन दिनों
जब भी कुछ लिखना चाहता हूं

कोई चुपके से आकर कह जाता है कानों में
--बेवकुफ़ चुप रहो
यहां कुछ नही होगा
जो तुम चाहते हो

सिवा
लफ़्फ़ाजियों
बतौलाबाजियों
के
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

भूख


गांव बडा है या कि देश ?
गांव बडा होता
तो सरहद पर कोई नही होता

पूछो उन भिखारियो से कि भूख बडी है या फ़िर देश ?
भूख बडी है
देश बडा होता
तो देश में कोई भिखारी नही होता ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 10 April 2013

जबरन


कभी लोग मेरा मतलब नही समझते
कभी मैं लोगों का

अक्सर नियति के खेल में
मात खाना मेरी किस्मत है

जिसे जबरन मैनें ही  गढा है
जिसमें केवल अपने मतलब को बेमतलब
देखना चाहता हूं
मैं ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 9 April 2013

कविता


कविता  अच्छी लिखने का मतलब
यह कतई नही होता
कि कविता वाकई अच्छी है

कविता अच्छी होने का मतलब
भी यह कतई नही होता कि
कवि वाकई अच्छा है

अब मानसर के कमल के फ़ूल
माली चहबच्चों में भी  खिलानें लगे है

बहुत से भिखारी करोडपति भी होते है
बहुत से करोडपति भिखारी भी ,..

सैकडों भूलभूलैयों  के कमरों से बने महल का मालिक
एक अकेला आदमी भी है

कविता भी इससे नही है
अभिन्न ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Monday, 8 April 2013

मित्रो,.. शीर्षक आप ही सोच ले



*********************************
नदी हमारे सामने  बह रही है
तट पर तुम भी हो
तट पर मैं भी हूं

जब मैं तुम्हें देख रहा होता हूं
तब तुम मुझे नही देखती
कुछ और देख रही होती हो

जब तुम मुझे देख रही होती हो
तब मैं भी कुछ और देख रहा होता हूं

इस तरह देखते हुए भी हम वह नही देख पाते
जो हम दोनो को यह बहती नदी देख रही होती है

हमारी नजरें जब मिलती है
तब तक नदी बह चुकी होती है

हम दोनो अपनी-अपनी राह  लौटने लग जाते हैं
बगैर कुछ बोले बतियाए

हमें लौटता देख किनारे का एक पेड सहसा  मुस्कुरा उठता है
उसकी जडें जो पानी में हैं
वह जानता है नदी अब भी बह रही हैं
रेत के नीचे

हमारी दृष्टि से परे
हमारी सोच से परे ।
-----------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 7 April 2013

कसूर


झूठ अब पहचान में नही आता
इतनी चमक है उसमें
इतना बारीक और धुला हुआ सफ़ेद है
कि यकीन ही नही होता
और साथ-साथ चलने लगता है
हमारे संग-संग

एक लंबा समय लगता है कलई खुलने में
और एक दिन जब खुलता है
तब खलता है
खीझ जाता हूं बहुत स्वयं से ही
कसूर तो अपना ही था न !
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 6 April 2013

ईश्वर


एक
*********
मेरे झोपडे में  धूप नही चढती
चांद के छत पर उतरनें का सवाल ही नही उठता

बगल में एक बजबजाता नाला बहता है
जो शहर और स्लम के बीच की सीमा रेखा बांटता है
जिसका नक्शा थानें में टंगा है
फ़र्श सर्द है
रात को  बंसहट खाट पर  एक मुर्दा लेटता है
जिसके मजदूरी दुख दर्द और प्रेम का अर्थ छोडिये
जिन्दगी और मौत का भी कोई लालपीला कार्ड नही होता

दो
********
भिखारियों के इस मुहल्लें में
अल्सुबह पुरा कुनबा कई मंदिरों  की सीढियां अगोरनें चले जाते है
जैसे मजूर जाते है सडक पर गिट्टियां जमाने कोलतार बिछाने
और शाम को अपने साथ ईश्वर लिये लौटते है और उसे आग में झोक कर
जी जाते है फ़िर अगली सुबह के लिये

तीन
**********
नुक्कड पर एक पंडित बैठता है पिंजरे में तोता लिये
जब कोई जजमान फ़ंसता है तब पंडित का चेहरा किलक जाता है
तोते का चमक जाता है
और कथा--कला सुनने   मैं वहां ठमक जाता हूं
पंडित  उसे डराकर सपने और टोटकें का ईश्वर बेचता  है
और जजमान का ईश्वर बडे सलीके से साफ़ कर देता है
और इस तरह एक कहानी पढनें की मेरी साध पुरी हो जाती है

चार
**************
ऎसा नही है कि इस मुहल्ले में कविता नही आती
आती है अपने सर पर  बासी साग भाजी तरकारियों की टोकरी लिये
शाम के बखत
ये फ़टेहाल लोग तरकारियों से ज्यादा उस कविता को देखते है
जो औने पौने दाम में उनकी रोटियां नमकीन कर जाती है
पाँच
********
मेरे झोपडॆ के सामने के एक झोपडे में एक बुढियां भिखारन
गोल कटी हुई खाट पर रोज अपना अंतिम दिन गिनती है
उसके पास मैं कुछ देर के लिये जाता हूं
वह मुझे बुलाकर बांचती है
हर रोज एक उपन्यास की धारवाहिक किस्त
छ:
***********
सुना है आज शहर के
पक्के मकानों के महल वाले  एक हाँल में बडे कवियों का सम्मेलन होने वाला है
इच्छा तो है कि वहाँ जाऊं
पर खाना खुद न बनाउं तो इतने पैसे कहाँ है कि नुक्कड पर खाऊं
और यह निगोडी देह जो टूट रही है दिन भर की जानलेवा मजूरी के दर्द से
अगर मै रात में सोऊं नही तो कल काम पर कैसे जाऊंगा
मेरा ईश्वर वह ठेकेदार भगा देगा तो क्या खाऊंगा
रहने दो भाई यह सब बडे लोगो की चीज है
हम जैसों के लिये नही ।
-------------------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 5 April 2013

भूख


समुद्र तट पर नंगे पांव चल रहा हूं
मेरे चप्पल और कमीज मुझसे भूखें नंगों ने छीन लिये है
धूप तेज है मेरे पांव जल रहे है
उससे तेज भूख से मेरा पेट जल रहा है

सैलानियों की भारी उमडी भीड है इस धूप में भी
लोग-बाग अपने-अपने परिवारों के साथ
लहरों का मज़ा लूट रहे है
कहकहों का अट्टहास गूंज रहा है
तश्वीर वाले कैमरा लिये घूम रहे है
रेहडियों की दुकानों वाले
खोमचें वाले हांके लगा रहे है
खासा जमघट है यहां
सबके तल में एक भूख है

रेत की कलाकृतियां बना रखा है एक गरीब कलाकार ने
अपनी भूख के लिये यही दुनियां है उसके लिये यहां की

रेत की तरह यहां बिखरी चमकती है असंख्य कविताएं
इनमें  कोई भी ऎसी कविता नही है जिससे मिट सके मेरी भूख

मछुआरे भी अभी तक नही लौटे शायद निगल चुका है उन्हे परसों का उग्र समुद्र
अब और चला  जाता नही इस रेत पर
नही किया जाता और  इंतजार उन मछुवारों का मछलियों का
जिनकी ढुलाई की एवज में मेरी भूख मिटती है

इससे पहले कि कोई बडी सी लहर मुझे निगल ले हमेशा हमेशा के लिये
मुझे कही दूर निकल जाना चाहिए
मुझे तलाश है एक ऎसी दुनियां की जहां भूख नही होती
इंतजार नही होता और कोई भुखा नही होता ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 4 April 2013

सच


सच बडा घिनौना है वीभत्स है

धुली हुई सफ़ेद चादर मे लिपटे
देहपिंड में रंग बिरंगे फ़ूलों का आवरण

घी चंदन के तेल का प्रलेपन
लोहबान जलती अगरबत्तियां

मालाओं की ढेर सी श्रद्धांजलियां
भी महका नही पाती तब  भीतर तक मुझको

जैसे सडती हुई लाश के नथुनों में ढुंसा होता है
रूई के फ़ाहें में लिपटा महकता मजमुआं का सेंट

जल रही चिता से उठती एक चिराईन सी गमक
से जब तिलमिला रहा होता हूं

उबकाई सी आने लगती  है तभी
फ़टता है सर एक बडी आवाज के साथ
पृथ्वी के प्रस्फ़ुटन की याद दिलाता

और विलीन हो जाता है भाप बनकर हवाओं में
राख बन कर फ़िजाओं में
कभी नही लौटने के लिये

या फ़िर छिप जाता है सच
किसी कब्र के नीचे किसी सड चुकी लाश के उपर मानो
संसार का सबसे सुन्दर संगेमरमर का मकबरा हो जैसे
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।




Wednesday, 3 April 2013

दायरा


यूं तो कविता की न कोई सीमा  है
और न कोई बंधा हुआ दायरा
यह कवि कविता की निजी धारणा है बस

सच में ऎसा नही है
कविता की भी एक सीमा है

इस सीमा से बाहर असंख्य लोग  है
एक सुनबहरा देश है
गरीब गुरबा
बैसाखियों के सहारे लंगडाकर चलते
आम जन लोग
और निम्न लोग
दबें कुचलें कुम्लायें
मैले फ़टॆहाल मलीन

और इनसे उलट

अपने सुखो मे तल्लीन
अपनी ही साधना मे लीन
जिन तक
कविता नही पहुंचती है ।
----------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 31 March 2013

सजा


सजा
उस न्याय प्रणाली को कौन देगा
जो बीस बरस बाद फ़ैसला करता है
एक सजायाफ़्ता अभियुक्त का
महज हथियार रखने के जुर्म में
मूछों पर न्याय का  ताव देते

सजा
उस  व्यवस्था को कौन देगा
जो हिफ़ाजत नही कर सकता आवाम की
चंद आतंकवादियों के बरपाए कहर से
चिथडों से उडते बेगुनाहो के लोथ की

एक बार नही
बार-बार
जिनकी  कीमत चंद मुवाबजो के सिवा कुछ नही होता
तुम्हारी नजर में
एक रिवाज सा बना डाला है तुमने
बस बात खतम
तब
क्यो न रखे कोई हथियार अपने घर
अपनी हिफ़ाजत के लिये

चौदह करोड मामले अभी भी सड रहे है
ठंढी फ़ाइलों में
जिसका फ़ैसला
मुवक्क्विल की मौत के बाद भी संभव नही है
तिस पर तुम्हारी सारी सरकारी छुट्टियां अलग

क्यो नही बनाते हर अंचल में न्यायालय
जज नही है कि वकील नही है
कि नही है सीमेंट छड और जमीन
कौन से राजस्व की कमी है आखिरकर
कर लगाने का अधिकार भी तो तुम्हारे पास ही है
चलते हो ऎसे कि
निर्लज्ज कछुए भी शर्मा जाए

किस मुंह से  कहते हो खुद को सर्वोच्च
और चलते हो सजा देने न्याय करने

कौन  देगा तुम्हें सजा
इस शैतान की आंत की तरह लंबी तारीखों की
एवज में
यह तुम ही बता दो स्वयं

कब तक आस्था रखते रहे तुमपर
एक जिम्मेवार नागरिकता की गठरी
सर पर लादे
महंगाई की रोज फ़ैलती सडक पर ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 30 March 2013

कविता




कविता
जब लत बन जाए
पान बीडी सिगरेट तम्बाकु शराब
जैसे बुरे व्यसनों की तरह

एक पाजी रोग की तरह जो
कभी नही छूटने वाली
तब उसका बहिष्कार कर देना उचित है

कविता
जब नाम कमाने का जरियां
मात्र पुरस्कार पाने का प्रदर्शन

किसी चोर इन्डस्ट्री की जीनत
मजबूर बाजार में  बिकने की  कीमत बन जाए
और
बंद हो  जाए चोरों मुनाफ़ाखोरों के गोदामों में
अनाजों से भरी बोरियों की तरह
तब उसका तिरष्कार कर देना एकदम  उचित है ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।



Thursday, 28 March 2013

मदनोत्सव



*******************
लो मदनोत्सव खत्म हुआ
आज से फ़िर वही सब कुछ झगडें फ़साद टंटे
फ़ब्तियां चुगलियां जुगालियां लाठियां और डंटे

गंगा नहाकर सारे पाप धो लेने के मानिन्द
फ़िर से  लौटकर आएगा
द्वेष मिटाने
हर बरस की मानिन्द
दुबारा
मदनोत्सव ।
-------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 26 March 2013

न जाने क्यो


सच की एक ऎसी ठोस जमीन पर खडा हूं
अकेला
यह जानते हुए अच्छी तरह
मेरे पीछे कोई नही आनेवाला

निहत्था हूं पथ पर
जबकि सामने है
हजारों झूठ
सच का तगमा लगाए
सच से भी ज्यादा चमकते
मुझे आईना दिखाते

अब ये आंखे किसी की चमक से
चुंधियाती नही है
न जाने क्यो ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Monday, 25 March 2013

रंग अलग अलग



**********************************
दलित टोले की होली अलग
वे पीटते रहते है अपना ढोल  झांझ मंजिरा अलग
उनका फ़गुआ अलग
रंग राग अलग

गरेड टोले कोइरी टोले यादव टोले
और ऎसे ही कुछ और भी टोले की होली भी अलग
फ़ाग अलग
राग अलग

सवर्ण और वैश्य टोले की होली एकदम अलग
इनके टोले में गाने बजाने आशिर्वाद लेने की पुरानी परंपरा
का बोझ अपने-अपने सिर पर लादे
सभी टोले को उनके टोले में जाना अनिवार्य है
वे अछूतो पिछडों के टोले मे नही आते कभी

ये टोले एक दरबार में मिलते तो है पर कभी नही मिलते
नही कहा जा सकता इस दासता को मिलना
नही कही जा सकती इसे होली
और न मिलन

सवर्ण टोले का कोई सिरफ़िरा भी दुनियाँ से गुजर जाए तो
शोक में डुब जाता है पुरा गाँव
पुरे गाँव की होली पर रोक

और दुसरे टोले का कोई सम्मानित भी गुजर जाए तो कोई
फ़रक नही पडता सिवा उस घर के और उसके गोतियां के घर के

आज भी गांव जवार की होली का रंग ऎसा ही है
यह पुराना रिवाज कही कुछ हल्का सा बदला तो है
मगर इसे बदलाव नही कहा जा सकता
और न होली

मैं होली में कभी भूलकर भी गाँव नही जाता
मुझे शहर की होली ही अच्छी लगती है

अच्छा लगता है यह  रंग अबीर गुलाल
जो एक दुसरे में
परस्पर मिल जाते है
भेदभाव  नही रहते

और नही भी मिले तब भी
किसी जातिगत सामंती बाध्यता की अपेक्षा तो कम से कम नही रखते

होली मुबारक हो आप सभी को ।
-------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 24 March 2013

लाँबियाँ


अपने अपने प्रांत की बोलियों बोलती  लाँबियाँ
दफ़्तरों में
कारखानों में

लगती है जैसे हो एक ट्रेन की ही बोगियाँ
ठहरती चलती अपने अपने प्रांत की ओर बस
केवल अपने क्षेत्र  की  ही सवारियों ढोती
अपने अपने प्रांत को आती - जाती

लोहे की गाडी  लोहे की पटरियाँ
और लोहे के लोग

और एक माटी का  देश
हर रोज जागता है लेकर जम्हायियाँ
लोहे के चने चबाकर
फ़िर सो जाता है
लोहे की चादर तानकर
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 23 March 2013

लोहा


लोहा लोहे से कटता है
आक्सीजन एसीलीटीन के गैस के ज्वलित दबाव से
कट तो जाता है पर उतना साफ़ नही कटता
जितना कि कटना चाहिये

हवा के आक्सीजन से अक्सीडाइज्ड होना
जिसे जंग लगना भी कहते है
इससे सड सकता है मगर कट नही सकता

कवि फ़ूल से लोहे को काटता है
कवि का लोहा लोहा नही होता
कुछ और होता है
जो भी होता हो हुआ करें
कवि जो मरजी वह किया करे

मगर इस सच को नकारा नही जा सकता
किसी भी तरह
कि फ़ूल से लोहा कटता है
और आज तक कोइ भी विश्वकवि लोहा नही काट पाया
और न पायेगा यह प्रमाणित है
इस देश का जंग आलूदा लोहा  कितना
चीमड है
सख्त है
जीवट है
गद्दार है
आज भी
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

भगत सिंह सुखदेव बिस्मिल की स्मृति में


भगत सिंह सुखदेव बिस्मिल की स्मृति में
*****************************************
चाहते हो अगर कि सर उठाकर जिये
और चलें फ़ख्र से सीना तानें
इस देश की सडक पर

तो मेरी दो बातों पर गौर करना ऎ ! मेरे दोस्तों
दो ही रास्तें बचें है केवल अब

या तो बनो सरकारी अफ़सर
या फ़िर  बनो कोई लीडर

चाहे जिस भी जुगत से या
जिस किसी बगुला भगत की सोहबत  से

मगर बनों तो यही दोनो में से बनो
चुनो तो यही दोनो में से कोई चुनों

इसके सिवा  कोई राह बची नही है यहाँ

कि बदल सकोगे तुम इस देश की दुनियाँ
और बचा सको अपनी ईज्ज्त व आबरू

अगर ऎसा नही कर सकते तो फ़िर लिखते रहो
उनकी तरह जो देश बदलने के लिये भूकतें रहे

लडते रहे फ़ाँसी तक पर लटक गए
और चले गए साहित्य रचते -रचते


मेरी बात पर यकीन न हो तो देख लो
अपने देश के साहित्य के इतिहास के पोथें
और इसकी उपलब्धियाँ

क्या हुआ  है आज तक ? लूट के चोथें
और
महज गाल बजानें के थोथें के सिवा ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Thursday, 21 March 2013

नदी

कविता सडने लगती है
उस तालाब की तरह
जो केवल
बारिश के भरोसे ही पडा रहता है

कवि भूल जाता है कि
कविता एक नदी है

और उसका बहते रहना
उतना ही रहना जरूरी है
जितनी जरूरी है भूख
दिन भर खटने के बाद की नींद
और वह प्यास  जिस  स्रोत से
निकलता रहता है पानी
निरंतर
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।


पैमाना


अभी परसों ही वह मिला था
अच्छा खासा था
आज अच्छा नही है

अजीब है यह
अच्छा और
खास होना
और हमेशा बने रहना

जिसे नापने का पैमाना
बाजार तय करता है ।

---------शिव शम्भु शर्मा ।


गर्मियां


फ़िर से आ गई गर्मियां
तेज धूप ठंढी कुल्फ़ियाँ

ठेलों पे लुढकती लस्सीयां
आम पुदीनें की पन्नीयाँ

बर्फ़िली शरबतें अनाप सनाप
फ़िर बिलों से निकलेगें साँप

फ़िर से  छोडने के लिये नये
केंचुल और
जहरीलें फ़ुफ़कार की भाप ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

प्रत्याशा




मैं  खडा हूं एक स्टेशन पर
पढ रहा हूँ चस्पाए वाल पर
एक चित्र युक्त कविता

कवि के शब्दों में शब्दचित्र है
छुपे बिम्ब  उभरते है मानसपटल पर
कुछ इस कदर कि
किसी और दुसरे चित्र की वहाँ
कोई जरूरत ही नही है शायद

फ़िर भी कवि चित्र लगता है
अंदेशा तो देखिये कितनी होती है आशा
और कितना छुपा होता है  डर
कितना प्यार कितनी प्रत्याशा

कि कोई निर्गुणधर्मी पटल छुट न जाए
कहीं बिम्ब बिना समझे ही रह न जाए
और कही उलझ न जाए उसकी कविता
अपने कथ्य की अन्तर्वस्तु से

सही सलामत पहुंच जाय  अपने मन्तव्य को
जबकि सही में ऎसा कुछ नही हो पाता
जितना कि होना चाहिये था

लोग मशरूफ़ है अपने अपने काम में और
चल पडती है ट्रेन अपने गंतव्य को
धडधडाती चलती रूकती हुई

इस बात से बेखबर
कि  मुसाफ़िर सोए है चादर तानें
फ़ुफ़ काटते
बिन्दास।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।




Sunday, 17 March 2013

क्यों है ?



मैं वह कलाकार नही हूँ
कि प्राण डाल दूं तराशे हुए पत्थरों की मूर्तियों में
और कह दूँ कि देखो यह ईश्वर है
और लोग अंधाधुंध  पूजने लगे
बगैर यह जाने समझें
कि ईश्वर कौन है
और है तो क्यों है ?

मै नही जानता आत्मा को भी
मैने इसे भी कभी नही देखा है
और जिसे अनुभव किया है
वह अवचेतन मन के सिवा कुछ भी नही है
यही तक मै अबतक पहुंच पाया हूं

मैं यह नही लिख सकता कि
सृष्टि से पहले भी मैं था
और आज भी मैं ही हूं
कल भी मैं ही रहुंगा

तुम नही समझ सकते मेरी बात
वो इसलिये कि तुमने अपनी आंखे बंद कर ली है

और यह मान बैठे हो कि
ग्रंथों में जो लिखा है वह सच है
क्योकि जन्मघुट्टी की तरह
यह अस्था तुम्हारे खून मे बहने के लिये छोड दिया गया है
हमेशा हमेशा के लिये

और तुमने सब मान लिया है
बगैर देखे बगैर समझे
मुझे माफ़ करना मै कलाकार नही हूं

एक अन्वेषी से ज्यादा कुछ नही मानता
खुद को
तुम नही समझ सकते मेरी पीडा
मेरे प्रश्न
मुझे माफ़ करना मेरे मित्रो ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

’मैं ’


मुझे चिढाता  रहता
यह कितना बडा उथलापन है या
कोई कुंठा अवसाद या मानसिक दिवालियापन है
अपना दुख औरो से कहते फ़िरते रहना
आखिर कौन सी समस्या के किस समाधान के लिये ?

क्या मेरी घुटन कम हो जायेगी ?
क्लांत मन निर्मल पोखर सा शांत हो जाएगा ?
आंखों का यह गीलापन खत्म हो जाएगा ?
अगर ऎसा होना होता तो फ़िर कोई  बात ही नही थी
मगर ऎसा होता कहाँ है ?

माना ऎसा हो भी जाए तब भी
मेरे लिये ही इतना जरूरी क्यो हो जाता है यह ?
यह बताने के बदले चुप क्यो नही रह सकता मै ?

यह सच है यह दुख बडा सालता  है
तभी तो यह मौन मुखर हो जाता है
शब्द अनायास फ़ुटने लगते है बेतरतीब

मेरे जैसे ना जाने कितने लोग अपना दुख किसी को नही बताते
निज विवेक से ही अपनी राह बनाते
दुसरो को प्रकाश दिखाते चलते है
फ़िर मेरे लिये ऎसा क्यो नही हो पाता ?
क्यो मेरा आत्मविश्वास दगा दे जाता है
क्यो निज विश्वास ही साथ छोड जाता है  मेरा ?

क्यो छिछोरा अहं आ जाता है सामने
यह निगोडा अहं बहुत जरूरी अंग है क्या ?
सरसों सी राई को तिल का ताड बनाता ?
मैं ऎसे क्यो जीता चला जा रहा हूं ?
वह कौन है जो मुझे अपने अधिकार से जीने नही देता
वंचित करता जाता रहता है

अपने अस्तित्व पर चढ बैठा शायद वही  ’मैं ’  हूं
इसी अबूझ ’ मैं ’ को जानना बाकी रह गया है
जिसे जानना सबसे पहले जरूरी था मेरे लिये
शायद यही है मानव का वह चेतन तंतु
जिसमे सब छुपा है
सब का सब
पुरा का पुरा
पृथ्वी और असीम ब्रह्मांण्ड का वह सच भी
जिसकी मुझे तलाश है
बेसब्री से ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 16 March 2013

मिलुंगा


नंगे पांव और खाली जेंब  लिये
मै जहा खडा हूं वहां से कौन सा रास्ता तुम तक पहुंचता है
यह नही जानता

पर यह जानता हूं खोज लुंगा वह रास्ता
जो तुम्हारी ओर जाता है

समय लगेगा मगर

तुमसे  मिलुंगा जरूर एक दिन
जुतें और राह खर्च के साथ ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

हरी दुबें


बरसात और ठंड के बाद इस बार

बलुअठ टीले पर कुछ हरी दुबें उग आयी है
पहली बार

अब गुनगुनी धूप तेज होने लगी है
धीरे- धीरें गर्म होने लगी है  हवाये

गुलमोहर की पत्तियां फ़लियां सूख चुकी है
जो फ़िर से खिल उठेगीं जल्द ही

मगर ये हरी दुबें  जल जाएगी
हमेशा हमेशा के लिये

और फ़िर से उजाड हो जायेगा टीला
उदास गुमसुम

नियति के खेल से रूबरू
और बेखबर
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 15 March 2013

भोर


आज की रात भी  फ़िर वैसे ही ढलेगी
जैसे ढलती आयी  है अब तक हर रोज
जैसे  गलता है बर्फ़ हिमालय का हर रोज
जैसे चाँदी सी चमचमाती बहती है सदानीरा नदी हर रोज
वैसे ही हम  फ़िर मिलेगें
भोर की सुखद हवा  के नई अनुभुति के साथ
शुभ रात्रि ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।


बाज़ार



**************
बाज़ार एक कठोर सच है
दुनियाँ का

विरासत मे मिली वर्ण भेद और
हैसियत से मिली अर्थ भेद
दोनो को एक अर्थ देने की
एक मात्र जरूरत ही नही है

एक रीढ है
लोथों  को खडा रखने की कवायद का आदमी नामा
विमुख नही रह सकते हम
इसके व्यापार से

समाज  विज्ञान साहित्य चाहे जो भी हो
उसे आना ही पडता है

हांके लगानें या खरीदनें
आखिरकर
बाजार में ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

रहने दो


बहुत कुछ देख कर जान चुके अब
हमें अनजान बने रहने दो

अपने गम से  ही  गुमसुम सही
हमें गुमनाम बने रहने दो

तुम कमा लो  सारे जहाँ की नेक-नामियाँ
हमें बदनाम बने रहने दो

तुम मनाओ हर रोज ईद दिवाली और होली
हमें केवल रमजान रहने दो

तुम बन जाओ अमेरिका लंदन औ ईटली
हमें तो बस हिन्दुस्तान रहने दो

मेरी मुफ़लिसी के सच से उठाओ न तुम यूं परदा
बस इतना सा इत्मिनान बने रहने दो

तुमसें बतियानें का अब कहाँ बचा रहा मेरा शऊर
उजडा ही सही मगर  मुझे
अपने  कब्रिस्तान में बने रहने दो ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 14 March 2013

खुदा


खुदा कोई निजाम नही है
कि किसी के कहने पे चला करे
किसकी दुआ  कुबूल करे वह जानता है
तुम्हारें गांव का वह हजाम नही है ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ॥

कचरा



देखता हूं अक्सर
घंटों पूजा करती रहती हो तुम
ईश्वर के मंदिर में

यह सही है कि पूजा के लिये एक मुकम्मल जगह चाहिये
कचरें के ढेर पर रहकर पूजा का मन नही बनाया जा सकता है
अगर ईश्वर कचरे में नही रह सकता है

तो यह जान लो  यह भी  सच है कि
ईश्वर में कचरा भी नही रह सकता है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।


Wednesday, 13 March 2013

मैं


पुरी उम्र जग जीतने के बाद
अब उनके पांव कब्र में लटके हुए है
और खाट का चाँचर चिता पर रखा है

शनि का पुच्छला आखिरकर क्या है ?
क्या है ब्रह्माण्ड  ?
कहाँ तक फ़ैला हुआ  है ?
और क्या हैं पिंड  ?

यह सब जाने बगैर
एक पशु की तरह अज्ञानी से वे भी चले जा रहे है
अनजान पथिक की मानिन्द

और अब वे हो रहे है विलीन
उन्हें देखकर
शर्मिन्दा हूँ
मैं
------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

रद्दी


प्रोफ़ेसर की तरह मत पढना
फ़िलाफ़र की तरह भी मत पढना

रद्दी के सिवा कुछ नही मिलेगा तुम्हें
बस एक पाठक की तरह पढना तभी कुछ मिल सकता है ।
----------------श्श्श ।

चक्रव्युह


सुख भी स्वत: आता है जैसे कि आता है दुख

पर तुमने अपने सुख के लिये रच डाला चक्रव्युह
कुत्सित बिसात बिछा कर पाखण्ड साधकर

और जीत  ले गए केवल सुख
अपने दल बल के साथ बांध कर

और लाद  गए दुखों की मोटरी
हमारे माथ पर
कि इसके बोझ तले  दबकर मर जाए हम
घुट-घुट कर

पर हम मरे नही है - मान्यवर
लडखडा कर ही सही चल रहे है मगर
पीछा करेगें तुम्हारा उस समय तक

नियति के  चक्रव्युह के उस समय तक
जो तुम्हारें रचे व्युह से परे का एक  नियत चक्र है
जहां किसी का चक्र नही चलता

जिसे आज तुम न देख सकते
न समझ सकते हो
और न
रच सकते हो
- सुखांध कही के ।

Monday, 11 March 2013

सावधान !


तुम्हारें आर्तनाद और चित्कार पर
तुम्हारें टुट कर बिखरने पर
तुम्हारें आंसुओं के बहते रहनें  पर भी

कोई तुम्हारें पास नही आने वाला
कुछ झूठी रस्मी दिलासाओं के सिवा

तुम्हारा दुख केवल और केवल तुम्हारा है
तुम्हारा खास अपना
किसी और का नही

मत दिखा
मत बुला
किसी और को मेरे भाई

सावधान !
इस मोड से आगे का रास्ता बंद है
आगे मौत है और कुछ भी नही

इससे पहले कि चकराकर गिर पडो
बैठ जाओं  चुपचाप यही

आंसु कुछ थम जाए
तो लौट जाना अपनी देह में

मरना तो है ही आखिर एक दिन
इतनी जल्दी  क्या है ?
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

बोलना


जरूरी नही कि
अपने खुले जख्म खुलेआम बताए जाए
जरूरी नही  कि
अपने भीतर छुपे प्यार को खुलेआम जताए जाए

कभी जरूरी नही होता है
बोलना
सिवा इसके
जीने या मरने के लिये  ।
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 8 March 2013

मै प्रेम के खिलाफ़ नही हूं, मात्र निज अंत:--स्वार्थ युक्त अतिविशेष अतिरंजना के खिलाफ़ हूं ,जिससे किसी अन्य को कोई फ़र्क नही पडना चाहिये यह मेरी व्यक्तिगत सोच है ।

अहं


अहं विवेकहीन होता है
आंखों वाले अंधे की तरह

यह निर्णय नही कर पाता कि
क्या सही है क्या गलत ?
और क्या होना चाहिये ?

अहं में जिद अकडा होता है
अपना स्वार्थ जकडा होता है

सच जान कर भी आंखे बंद कर लेता है
शुतुरमुर्ग की तरह कभी-कभी

मात्र
स्वयं के सही होनें के सिवा
और कुछ नही देख पाता है

स्वयं का पक्षधर अहं
निष्पक्ष नही हो पाता है

यह सत्य से उपर चला जाता है
और
मित्रता को
सह्र्दयता को
चबा कर खा जाता है  ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 7 March 2013

प्यार करो पर


प्यार करो पर
अब इतना भी प्यार ना करो अपनी प्रेयसी को
कि शर्मा जाए पिता भाइ बहन का प्यार
लजा जाए उस माँ का प्यार

जिसने तुम्हें सबसे पहले किया था प्यार
और आज भी करती है उतना ही

तुम भी पिता बनोगे
और वह भी एक दिन माँ
बचा रहने दो अपने बच्चों के लिये भी कुछ
सब यूं ही लुटा दोगे तो बचेगा क्या ?

कुएं नदी समंदर की तरह नही हो तुम
कि बहता रहेगा सोता
उमडता रहेगा पानी हमेशा

सूख जाते है सोते
और समुद्र का पानी पीने के लायक नही होता
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

गुल


अब सुनी नही जाती
आवाजें उनकी

देखी नही जाती
मुसकुराहटें उनकी

जिनके महज दीदार के लिये
ठमक जाया करते थे लोग घंटो--पहरों

गुल खिला करते थे कभी
जिनकी रंगत को देखकर
गोया उनके चेहरें पे अब वो रौनक नही है ।
--------------------शिव शम्भु शर्मा

Wednesday, 6 March 2013

कविता का मतलब


अगर कविता का मतलब
एक गुलाब लेकर अपनी प्रेयसी को रिझाना
उसके विरह में विलाप करना है

अगर
बेगैरत हुक्काम की ताबेंदारी चापलुसी करना
गुमाश्तें की तरह छतरी ढोना और कानाफ़ुसी करना है

तो नही लिखनी है मुझे ऎसी कोई कविता
कह दो उन्हें
जो शब्दकौशल शब्दचित्र और शब्दबिम्ब के चातुर्य
का हुनर रखते है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 5 March 2013

कविता


जिन्दा रहने की जद्दोजहद में
इतना समय कहाँ है
कि पढी जाए कोइ कहानी

उपन्यास की तो सोच भी नही सकता
किस्तों में इतना बांट लिया है
हमने खुद को ही

अमूमन हर रोज एक जिन्दा कहानी
धारावहिक उपन्यास की सांस लेती किस्तें

चीखते छटपटाते और मरते
आदमी को अनायास देख लेता हूं

गलियों  चौराहों नुक्कडों बाजारों पर
भीख मांगते बच्चें स्त्रियां बूढों को
रिरियाते आदमी को
मुंह छिपाती  औरतें और
फ़िकरे बाज मनचले निठल्लों को

अब कहां कहां
क्या-क्या बताउं ?

क्या- क्या है या नही है  क्या होना चहिये क्या नही
यह   तय नही कर पाता
अपनी आंखे बंद भी कर लूं
तो कान का क्या करूं

और क्या करूं उस मन का
जो वह विवश कर  देता है सोचने को

बस किसी तरह पढ लिख लेता हूं कोई कविता
यही बहुत है
इसमे ही समय कम लगता है
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

अजनबी



****************
वसुधा पर कोई अजनबी नही है
सभी की  एक पहचान है
सब के सब हमारें कुटुम्ब है

वसुधा के मानव प्राणी मात्र ही नही हैं
सब हमारे ही भाई -बहन हैं

तभी तो कहा जाता रहा  है -- वसुधैव कु्टुम्बकम

इन्ही कुटु्म्बों में से दो कुटुम्बों ने
दखल कर रखा है हमारे बडे -बडे भू खण्ड

और लील रहे है बेकसूरों को
बोकर बारूदों का जहर
ढा रहे है कहर

ये अजनबी तो नही है मगर
अजनबियों से भी गये गुजरे हैं

इन्हे हम क्या कहे ?
और क्या कहे तमाशबीन बनें स्वयं को भी ?

यही नही
न जाने कैसे ये वसुधा के  कुटुम्ब ही रचाते है
आपस मे शादियां
भाई-बहन का रिश्ता भूलकर

यह वसुधैव कुटुम्बकम कही हाथी का बाहरी दांत तो नही है ?
जो केवल हमारे ही पास है

कही हम ही एक महान तो नही है पुरी वसुधा में ?
या सच कुछ और है ?

जो शायद कही गुम हो गया है
अजनबी की किसी परिभाषा में ?
या किसी कौटुम्बिक रिश्ते की
कायर कातर आशा में ?
--------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 4 March 2013

अजनबी


अजनबी ही होता है वह
जो चलते-चलते राह पर गिरे आदमी को उठाता है
अजनबी   वह भी होता है
जो उस बेसुध का बटुआ उडा ले जाता है

अजनबी ही होते हैं वह
जो भगदड में रौंद कर अजनबियों की जान ले लेते हैं
और पलट कर भी नही देखते

अजनबी ही होता है वह भी
जो खचाखच भरी भीड में खुद उठ कर किसी असमर्थ को बैठने की जगह देता है

अजनबी ही होता है वह
जो ट्रेन से धकिया कर कमजोर बुजुर्ग दंपति को नीचे फ़ेंक देता है
इस बात से बेखर कि गिरने वाले का क्या हुआ ?

अजनबी ही होता है वह
जो खून से लथपथ छटपटाते को देख कर एम्बुलेंस मंगवाता है
अजनबी ही होता है वह भी
जो यह माजरा देखकर कतरा कर निकल जाता है

अजनबी ही होती है कभी वह भी
जिसके साथ  पुरी उम्र कट जाती है
और पता भी नही चलता

अपनी सी वह भी अजनबी ही होती है
जो सारी उम्र तिल तिल कर मरनें को छोड जाती है

अजनबी ही होते है वह भी
जो  खून के रिश्ते से अपने सगे होते हैं
जो किसी मातम या संकट की घडी में झाकनें तक नही आते हैं

इस अजनबियों और अपनों से भरी दुनियां में सबसे पहला अजनबी मैं हूं
जो आजतक नही जान पाया कि असल में अजनबी कौन है ?
मै ?
या फ़िर मेरे बाद की यह पुरी दुनियां ?
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।



Sunday, 3 March 2013

अजनबी



************
भीड बहुत है
शोर  बहुत है

कुछ कह नही सकता
कुछ सुन नही सकता

सर दुखने लगता  है
मन कराहता है

इसलिये नही कि एकांत नही है
इसलिये नही कि मन शांत नही है

बल्कि इसलिये कि अपनो परायों
और अजनबियों के बीच
मैं कितना बेबश हूं

कितना अकेला

और स्वयं कितना
-अजनबी ।
----------शिव शम्भु शर्मा ॥

Saturday, 2 March 2013

स्तनपायी


न मैं तुम्हें देखता हूं
न तुम मुझे

न मैं तुम्हें समझता हूं
न तुम मुझे

हमारें तुम्हारे बीच के आदमीयत
के रिश्ते से पहले का
एक रिश्ता जरूर है

वह यह कि हम दोनो ही
जानवर हैं
अलग--अलग---स्तनपायी ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।


भलमनसी



****************
किसी अनजान सडक पर
चलते-चलते
जब आगे पीछे कोई गाडी नही हो

तब मेरे मित्रों को सडक के बीचों बीच
गाडी चलाना बुरा नही लगता
उन्हें इसमे मजा आता है

बुरा मुझे लगता है
नियम हर हाल मे नियम होता है
इसमे  छुपा होता है एक अर्थ

क्या पता कच्ची या पक्की कोई दुसरी सडक
नब्बे के अंश कोण पर आ मिली हो
पॆडों झुरमुटों की कतारों की आड मे छुपी
और चला आ रहा हो कोइ अजनबी
अचानक
कुछ भी हो सकता है

एहतियातन मेरे विचार
मेरे मित्रों से कभी कभी नही मिलते

कई बार विचारो के नही मिलने पर भी
हम अलग नही होते

इसका मतलब यह तो नही होता
कि मित्रता ही समाप्त कर दी जाए

अलग -अलग सोच और वाद के लोग भी
साथ- साथ चल सकते है

जरूरत  है बस केवल एक
भलमनसी की
जो समझ सके
एक भलमनसी को

इतना ही बहुत है
मित्रता  के लिये
-------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 1 March 2013

शोर


हमारे पुरखें जैसे भी रहे हो पर
शरमायादार थे

तभी तो बची हुई है आज भी
शरम ओ हया थोडी- थोडी

वरना ये नए सफ़ेद पोश
सफ़ेदी उतार कर

नंगई का नाच नाचते
और इनके गुर्गे

ताली बजा-बजा कर
हराम के शोर से खराब कर देते हमारा जीना

यह दिन देखने से पहले
हम अपनी आंखे बंद कर लेते

और सागर के  किनारे ठहर कर
नम हवाए खा रहे होते
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

पुरस्कार



ये निगोडा पुरस्कार न हो तो
शायद कोइ साहित्यकार भी न हो

बडी मुस्तकबिल है यह चटनी
अगर यह निगोडी न हो
तो शायद कोइ चाटुकार भी न हो
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

ज्वार


रोज रोज कविताए लिखना
कोई रोग
या कोई लत नही है

एक ज्वर है
एक जूडी ताप का ज्वर

जो चढता है ज्वार की तरह
बहा ले जाता है समेटकर

खर पतवारों  को साथ -साथ
अपने संग -संग
वह सब कुछ
जो सामने होता है

एक भाटा है
जब उतरता है
तब रह जाती है प्रतिपल
तरंगो की हिलोरों की शक्ल बनकर
अनवरत
सांसो की तरह

और शांत हो जाता है तब मन
समुद्र तल की तरह
बिल्कुल
प्रशांत ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

आनंद


स्वच्छंद सा एक
आनंद छुपा रहता है

मनचाही पढने
और  लिखने में

खुद के लिखने के बनिस्पत
ज्यादा तवज्जों देता हूं

लोगो की कृतियां पढने में

फ़र्क नही पडता कुछ भी
एक समान सा
सुकून  दोनो में है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 27 February 2013

लाहौल विला कूव्वत


उनके कविता संग्रह को
एक रस निकालने  वाली मशीन में पेरा
बस एक ही शब्द बाहर निकला
--प्रेम

कहानी संग्रह से निकला
---प्रेम जीवन है

और उपन्यास के संग्रह से निकला
--प्रेम समाज का जीवन है

इतनी बडी कवायद के खर्च का परिणाम निकला
बस ढाई अक्षर

जो एक फ़कीर संत मुफ़्त में दुनियां को बता कर चला गया है

मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला ---लाहौल विला कूव्वत ।
--------शिव शम्भु शर्मा ॥

Saturday, 23 February 2013

हम माटी के लोग

हम माटी के लोग 

पेट से उपर ही नही कभी पहुंच पाते 
और तुम दिल की बात करते हो ?

हम क्या जाने दिल और गुलाब
हम तो जर्रे है जमीन पर पडे हुए
हम क्या जाने कैसा है आफ़ताब ?

भूख ने कभी हमे चैन से जीने ही नही दिया
हम कैसे जमाए तुम्हारी तरह पैसे बेहिसाब
और पढे तुम्हारी मुहब्बत की किताब ।

बी पी एल का भी झटक लिया तुमने खिताब
अब इंदिरा आवास भी तो तुम्हारा ही बनता है 

रहने दो अब और न खुलवाओ अपना पंचनामा 
हम माटी के लोग है हमें माटी में रहने दो जनाब ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

चाहता बस इतना ही


चाहता बस इतना ही
**********************
उन्मुक्त रहुं परिन्दों की तरह
कभी इस डाल तो कभी उस डाल
कभी यहां तो कभी वहां

उडता रहुं जैसे उडते  धूल कण
पवन में

खिडकी से आइ
लकीर सी धूप में जो
देता है  दिखाइ

चाहता नही बंधना किसी बंधन में
चाहे वह प्रेम हो या फ़िर हो रूसवाइ

विचरता रहुं असीम गगन में या
यायावर सा घूमता रहुं निर्जन वन में

या रहुं खडा किसी समुद्र तट पर
लहरों से खेलता रहुं सदा

पडा रहुं  किसी चट्टान की तरह
होता रहुं मुलायम हर दिन
खाता रहुं थपेडें अन गिन


जाना पडे कभी अगर तो रोऊ नही
चाहता बस इतना ही
हंसते -हंसते हो मेरी विदाइ
-------------श्श्श।


Thursday, 21 February 2013

साकार


आप लिखते है ---
लेख कविता कहानी उपन्यास
बनाते है कार्टून
बनाते लिखते रहि्ये

छापते रहिये
छपवाते रहिये

बेचते रहिये किताबें
--लो दही लो दही
के हांके लगाते रहिये

कुछ बिक जाए तो
मगन हो जाइये फ़ूल कर कुप्पा-टुप्पा हो जाइये
और मान लीजिये कि आप है एक उम्दा साहित्यकार
और बटोरते रहिये  इसके एवज मे नाम के तगमें व पुरस्कार

अपना खून जलाते रहिये
अपना पैसा गलाते रहिये

कभी आपने यह सोचा भी है कि
आपका लिखा देखता पढता कौन है ?

---कुछ निठल्ले
---कुछ अधपगलाये
---कुछ यात्री
---कुछ शौकिया किस्म के लोग बस
---फ़िर सब फ़ुस्स.....

जहां तक जिन तक पहुंचना चाहिये वहां तक कभी पहुंच पाता है ?
---खैर छोडिये जाने दीजिये इससे आपको क्या मतलब ?

--सकारात्मक सोचते रहिये
साकार सोचने से सब प्रकार के आकार अपने आप साकार हो जाता है

अगर स्वयं के लिये लिखते है तो यह बहुत अच्छी बात है
मै भी तो यही कर रहा हूं फ़िर लिखते रहिये
मुझे भी यह अच्छा लगता है ।
-----------------------श्श्श ।

Tuesday, 19 February 2013

लंबी तान के न सोऒ


लंबी तान के न सोऒ
************************
सब लोग नही देख सकते
कभी  सभी को
मुनासिब नही है यह कभी

नही देखते तो क्या ?
नही समझते तो क्या ?

तुम चलना छोड दोगे
उस पथ पर
जिस पथ पर तुमने
चलने की ठानी है ?

पृथ्वी चाँद सूरज सितारे
कब किसकी परवाह करते है
चलते नही रहते है क्या ?

कौन रोक सका है उन्हे
जरा बताओ ?

ये अर्थहीन विषैले चमक के पीछे
बेतरतीब बेतहाशा दौडती भीड
नही समझती तो न समझे
तो तुम भी  समझना छोड दोगे क्या ?

रूको नही देखो नही
कभी पलट कर
अपना काम किया करो
बिना किसी रूकावट के

तुम तो हो ही देखने के लिये
खुद को
यही बहुत है जिन्दगी के लिये
खुशी के लिये

हां ! अकेला ही सही
अकेला आदमी
आदमी नही होता क्या ?
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 18 February 2013

जीवन दूत


नीम का पेड ( अघोरी पर एक लेख देखकर )
**************
रेलवे के उस हाल्ट पर
धूल धुसरित नीम का वह पेड
साधनारत
हिलता लचकता मुस्काता खडा है

यात्रियों को छाह देता
मुंह धोनें के लिये दातून देता
हवाओ को शुद्ध करता रहता
गिलहरियों पक्षियों चीटियों
कभी दुत्कारता नही
अपना फ़ल देता है
जीवन देता है

किसी से अपना गम नही कहता
न मांगता है न उलाहने देता
और न श्राप देता

कितना शांत अविकल खडा है
वह प्यारा नीम


उस धूनी रमाये अधोरी से बहुत उंचा है
जो गालियां बकता मांस खाता
पेशाब पीता रहता है
केवल अपने मोक्ष के लिये

पेड अधोरियों की तरह
स्वात:सुखाय नही होते
नही चाहते
नही साधते
केवल अपने लिये किसी
कुत्सित इच्छित कामनाओं का जखीरा

हंसते झूमते रहते  पुरी कायनात
के प्रेम मे मगन
जीवन दूत
मुझे उस नीम के पेड से प्यार है ।
-----------शिव शम्भु शर्मा ।


Saturday, 16 February 2013

एक समय मर रहा है


आलोचक जब भी कविता लिखते है
संभल कर लिखते है

उनका
बनावटी
सजावटी पन

फ़िसल जाता है तब
बूढे साहित्यविदों
की पैनी पुरानी पड चुकी चश्में के नजर की धार से

एक समय मर रहा है
कभी नही लौटने के लिये

मुझे अब भी  इंतजार है
उनके बोलने का
जो सवाल नही करते
मुस्कुराकर चुप रहते है ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 15 February 2013

हवा


गिला नही
शिकवा नही किसी से
मुझे माफ़ कर देना मेरे भाइ
आदमी नही अब हवा हूं
किसी
रिसतें नश्तर की दवा हूं
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 14 February 2013

श्रीमान जी


श्रीमान जी
***************
कोई भाट चारण बंदी या मसखरा नही हूं मै
बरफ़ का तेल नही बेचता मै
शब्दो के बिंब से
चमत्कारी तिलिस्म बनाकर
बाजार सजाकर
पुडियां नही बेचता  मै
मुझे माफ़ कीजिये श्रीमान जी ॥
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

नया सवेरा


नया सवेरा
***************
एक मंच से लाउड स्पीकर से कुछ आवाजें आती है
कोई बडा आदमी बोल रहा है शायद
मेरे पांव अनायास चले जाते है
उस मंच की परीधि में

मै ध्यान से
खडा सुनता रह जाता हूं उन्हें
वे बोलते जाते है
उदाहरण देकर समझाते जाते है

और चले जाते है किसी दुसरे मंच की ओर
अभी आता हूं कहकर

मै खडा रह जाता हूं वही
प्रतीक्षा रत
और फ़िर हो जाता है
नया सवेरा ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।

रेगिस्तान



***************
एक बरस से
हर रोज दो चार घंटे
एक रेगिस्तान की रेत में गद्ढा खोद रहा हूं
इस उम्मीद और आस के साथ
कि इस रेत के अंदर आखिर क्या है ?

पहले कभी यहां समुद्र था
तो आखिर कहां चला गया  इसका  इसका पानी ?

कही तेल तो नही बन गया ?
और छिप तो नही गया सदा के लिये
किसी बैसाल्ट की चट्टान की परत के नीचे ?

मैदानी इलाकों में इतनी मेहनत से आ गया होता अब तक पानी
यह जानता हूं यहां तो सभी खोद लेगे
पर इस मरे रेगिस्तान का क्या करूं?
जो रहस्य बना चिढाता रहता है मुझे
मेरे लिये अभी  भी यह एक चुनौती है


अभी तक अपने कद से ज्यादा नही खोद पाया हूं
हर दुसरे दिन यह गड्ढा मुझे भरा मिलता है
रेत की निगोडी आंधियां मुझे हरा देना चाहती है
मेरे किये पर फ़ेर देती है पानी


मुझे जुटाने होगे  वैसे उपकरण जो खोद सके एक अदद गद्ढा
छेद सके कठोर चट्टानो को

और यहां कोई है भी नही मेरे सिवा
जिसे पुकार कर बुला सकु
और पता लगा सकु उस स्रोत का
मेरे भीतर के उस कौतुहल का
जिज्ञासा  का

मैदानो में खोदना कठिन है और प्राप्य आसान
इस रेगिस्तान में खोदना आसान है और प्राप्य कठिन

मै अकेला ही सही
पर मै हारा नही हूं अब तक
खोजकर ही रहूंगा

सहारा कालाहारी जैसे इस मरू देश के थार का रहस्य
लिखुंगा और
खुद पढुंगा
और  करूगा हस्तांक्षर
एक दिन यही
इसी जगह ॥
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।



आज यह फ़ेसबुक पर यह पढने को मिला ,.. वासना रहित निस्वार्थ प्रेम श्री कृष्ण (ईश्वर) है आराधना शब्द का "राध्य" प्रतिरूप स्वयं राधा है ।


आज यह फ़ेसबुक पर यह पढने को मिला ,..
वासना रहित निस्वार्थ प्रेम श्री कृष्ण (ईश्वर) है
आराधना शब्द का "राध्य" प्रतिरूप स्वयं राधा है ।
*********************************************

आखिर प्रेम में ऎसा क्या छिपा हुआ है
जो यह  ईश्वर है  ?

फ़िर ऎसा क्यों होता है कि
पुरूष स्त्री से
स्त्री पुरूष से ही केवल क्यो प्रेम किया करते है
क्या प्रेम करने के लिये और कोई दुसरा प्राणी नही मिलता ?
और  फ़िर प्रेम विवाह भी करते है ??

प्रेम अगर वासना रहित है
निस्वार्थ है

तो ऎसा क्यो नही होता कि
पुरूष अथवा स्त्री एक दुसरे से प्रेम / विवाह  नही करके
किसी पेड या किसी लाजवंती पौधे से प्रेम करते हो ?
और उनसे ही विवाह भी करते हो ?

क्या यह सही नही है कि प्रेम भी एक वासना है ?
(जबकि वासना एक व्यापक शब्द है )

वासना मे स्वार्थ है
स्वार्थ में आनंद है
और आनंद में तृप्ति है ??
और आनंदपूर्ण तृप्ति ही प्रेम की आधारशिला है

क्या यह सही नही है कि यही प्रेम की  बुनियाद है
और इसी बुनियाद पर खडा है विश्व और ईश्वर ??

अगर यह बुनियाद सही नही हो तो  फ़िर यह सृष्टि ही नही चलेगी
फ़िर बचेगा क्या ?
फ़िर प्रेम क्या ?
नफ़रत क्या ?
श्री कृष्ण क्या ?
और राधा क्या ?
फ़िर कुछ भी तो बचेगा ही नही   मेरे बंधुओं ??

हो सकता है मै गलत कहता होऊ
फ़िर आप बताए कि सही क्या है ?
-------------------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 12 February 2013

वाकपटु



**********************
वाकपटु श्री वाचाल जी चाहते थे
कि हम उनकी हर बात मे जी--हुजुरी करते रहे
मित्र शब्द  का अर्थ-- उनकी नजर मे " चाटुकार " था

उनकी हाँ में हाँ मिलाकर
जो बनाये रखता हो  उन्हे साहित्यकार
और करता रहता हो सदा  उनकी जय जयकार

हमारे  स्वतंत्र उन्मुक्त साम्य विचारो का स्वाभिमान
उनके उपर उठने मे रोडा था शायद

खुदा करे वे  और भी
उठ जाए जमीन की सतह से उपर
ये दुआ है हमारी

हमारा क्या है
हम जमीन की ठोकर है
जन मजुर और नौकर है
हो जाएगा हमारा कही भी गुजर बसर ।
                  --------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 5 February 2013

शोक


तुम नही जानते दुख क्या होता है
और क्या होता है शोक
कितना अंतर है दोनो में
तुम नही समझ सकते

कितनी मोटी लकीर से अलग अलग है दोनो
दुखों पर मुस्कुराना आसान हो भी जाए शायद
पर शोक पर मुस्कुराना एक पागलपन ही होगा
या फ़िर होगी कोइ ज्ञान की चरम अवस्था

शोक सालता ही नही
मार डालता है
शब्द बिला जाता है तब

शोक एक उंची लहरों की तरह आता है
और अपने साथ
लेकर चला जाता है सबकुछ
कोई निशान तक भी नही छोडता
तुम नही समझ सकते

सारी कविताए कहानियां संगीत और ढांढस भी
तब पास नही फ़टकते
बचा रह जाता है बस एक मौन
अनंत को निहारती केवल दो फ़टी उदास आंखे

और रह जाती है एक चिर प्रतीक्षा जिसे
वक्त के सिवा कोइ दुसरा नही
समझ सकता
और न
समझा सकता है
यह तुम नही समझ सकते ॥
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

पता नही वह कौन है ?


पता नही वह कौन है ?
**********************************************
ऎसा  नही है कि यह बडा जहाज अब डुबने से  बच जाए
सवार मैं भी हूं इस पर
एक बछडे की त्वचा के खोल में भरे भुसें की मानिंद खडा देखता

मर तो मैं उस दिन ही गया
जिस दिन इस जहाज पर धकेल  कर लाया गया था
अपने ही लोगो द्वारा जबरन  घसीट घसीट कर

जहाज के कानून के मुताबिक
धर्म संप्रदाय और जाति के विरूद्ध
बोलने और चलने के संगीन अपराध के   इलजाम पर

झाडु और पोछें की अहमियत एक ऎसी हिकारत है
जिसमें आदमी का होना    नही होना
एक बडे पर जहाज पर कोइ मायनें नही रखता

पानी में डुबी हुई उत्ताल लहरों के फ़व्वारों के कोहरों में छिपी
मुझे सामने दिख रही है बहुत  कडी -- कडी कट्टर पथरीली हत्यारी चट्टानें

मेरी आंखे खुली हुई है
और पुतलियों की तंग गलियों में एक फ़टी चटाई पर बस थोडी सी  चेतना जिन्दा है
मुंह पर पट्टियां बंधी हुई है
और पुरा देह जंजीरों से जकडा हुआ है
जहाज के मस्तुल पर के झंडे के नीचे
बेजुबान

हेली पैड से लैस
रडार और सोनार की केबिन में एक ताला लगा हुआ है

यात्री और कर्मचारियों का हुजुम  क्रुज की नृत्यांगना के नृत्य के बैंड की थाप पर मदहोश हैं
कौन कितना बेहतर नाचता है उनमें इस बात की होड है

एक दुसरे की टांग में लंगडी फ़साकर उसे गिरा देना और उसकी लाश पर नाचना
यहां प्रथम पुरस्कार माना जाता है

जहाज के मालिकाना कब्जें में साझेदारी और
जीतनें  वाले को सोने और हीरों से जडा मुकुट बतौर पुरस्कार दिया जाता  है

इस बात से बेखबर कि जहाज किस राह पर और  किधर चला जा रहा है

जिनके कांधे पर जहाज की जिम्मेवारी है
वे अपने अपने स्वर्ग समेटे गुटों में बंटे केबिनों में  अलग अलग थिरक रहे हैं

खाली बोतलों की तरह
लुढक चुके बेहोश कप्तान को  मै देख पा रहा हूं
बडे बडे हवा भरें ट्युब  छोटी नावें और हेलिकाप्टर रहने के बावजूद
मेरे सामनें फ़िर एक बार एक टाईटेनिक डुबने वाला है

मैं एक बेजुबान निरूपाय बंदी हूं
मेरी आंखो का मीठा पानी  इस खारें समुद्र मे अर्थहीन है
जहाज के साथ-साथ डुबना तय है मेरा भी

और मै यह  जानता हूं कि मेरा यह देखना समझना किसी काम का नही है
फ़िर भी पता नही वह कौन है ?
जो मेरे कान मे आकर चुपके से कहता है कि

एक जहाज के डुबने से पुरी सभ्यता समाप्त नही होती
फ़िर कोई न कोई जन्म लेगा गलत को गलत कहने की हिम्मत लिये

और यह भी कहेगा --
कि ऎसी बेहोशी और मदहोशियों से भरे लोगों का
देश देश नही रहता वह
समाप्त हो जाता है
हमेशा हमेशा के लिये ॥
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Sunday, 3 February 2013

अदृष्य


कभी
वे भी हमारी तरह थे
महत्व उनका
उनलोगो ने  बढा दिया
जो उनकी ही तरह थे
हत्यारें

सोने के कटोरे की तलें की धूल
नही दिखती कभी
हवा की तरह रहती है
अदृष्य
-------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 2 February 2013

केचुए पर एक कथिका



केचुए पर एक कथिका  लिखना पडा 
**********************

केचुए हैं हम 
तर मिट्टी में मुँह छिपायें
बारीश के तेज कटाव पर
बहते है 
तर बतर

सरकतें है जमीन पर 
दर बदर

कभी हमारी भी थी रीढ 
हमारे पुरखें ऋषि दधीचि के गोतियें थे
दान मे दे दी थी उन्होनें
सपोलों को
सपोलें उसी रीढ से
सांप बने

अब वही सरसरातें है
और हम 
सरकते है
उचक उचक कर
चींटियाँ हमें चाट जाती हैं

एक ढेंर सारी खंभों वाली इमारत की 
मुंडेर पर चढे
चुनें मे पुतें कौवे
मुस्कुराते हैं
हमें देख कर
और हम गड जाते है
मिट्टी में दुबारा 
बारीश के नही आने की दुआ करतें ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Thursday, 31 January 2013

तुमसे मिलने आयेगे



नदी ओ नदी !
तुम कभी रूकती क्यों नही ?
बहती क्यों रहती हो ?
ढलानों की तरफ़ तो सभी फ़िसलते है
क्या तुम भी उन जैसी  ही हो

उचाईयों पर के पहाड कितने हरे भरे है

हम तपती नंगी  झुलसती घाटियां
सूखे पेड और सूखी झाडियां हैं
सूख कर भी हम नही  सूखते  है
तुम्हारी आस मे खडे राह तकते है

बारिश की फ़ुहारें  भी हम तक नही टिकती
वह भी तो  तुमसे ही जाकर मिलती

क्या तुम हमसे मिलने नही आओगी
हम तक पहुंचनें से कही तुम भी
तो नही डरती ?

हम तो किसी से नही डरते
चलो जाने दो
रहने दो
मत आना

भुरभुरे हो कर हम जब झड जायेगें
मिट्टी मे मिलकर
पानी के संग बह कर

तुमसे मिलने आयेगे
तुम आओ न आओ
हम तुमसे मिलने आयेगें।
-----------शिव शम्भु शर्मा ।