स्वागत है आपका ।

Sunday, 31 March 2013

सजा


सजा
उस न्याय प्रणाली को कौन देगा
जो बीस बरस बाद फ़ैसला करता है
एक सजायाफ़्ता अभियुक्त का
महज हथियार रखने के जुर्म में
मूछों पर न्याय का  ताव देते

सजा
उस  व्यवस्था को कौन देगा
जो हिफ़ाजत नही कर सकता आवाम की
चंद आतंकवादियों के बरपाए कहर से
चिथडों से उडते बेगुनाहो के लोथ की

एक बार नही
बार-बार
जिनकी  कीमत चंद मुवाबजो के सिवा कुछ नही होता
तुम्हारी नजर में
एक रिवाज सा बना डाला है तुमने
बस बात खतम
तब
क्यो न रखे कोई हथियार अपने घर
अपनी हिफ़ाजत के लिये

चौदह करोड मामले अभी भी सड रहे है
ठंढी फ़ाइलों में
जिसका फ़ैसला
मुवक्क्विल की मौत के बाद भी संभव नही है
तिस पर तुम्हारी सारी सरकारी छुट्टियां अलग

क्यो नही बनाते हर अंचल में न्यायालय
जज नही है कि वकील नही है
कि नही है सीमेंट छड और जमीन
कौन से राजस्व की कमी है आखिरकर
कर लगाने का अधिकार भी तो तुम्हारे पास ही है
चलते हो ऎसे कि
निर्लज्ज कछुए भी शर्मा जाए

किस मुंह से  कहते हो खुद को सर्वोच्च
और चलते हो सजा देने न्याय करने

कौन  देगा तुम्हें सजा
इस शैतान की आंत की तरह लंबी तारीखों की
एवज में
यह तुम ही बता दो स्वयं

कब तक आस्था रखते रहे तुमपर
एक जिम्मेवार नागरिकता की गठरी
सर पर लादे
महंगाई की रोज फ़ैलती सडक पर ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 30 March 2013

कविता




कविता
जब लत बन जाए
पान बीडी सिगरेट तम्बाकु शराब
जैसे बुरे व्यसनों की तरह

एक पाजी रोग की तरह जो
कभी नही छूटने वाली
तब उसका बहिष्कार कर देना उचित है

कविता
जब नाम कमाने का जरियां
मात्र पुरस्कार पाने का प्रदर्शन

किसी चोर इन्डस्ट्री की जीनत
मजबूर बाजार में  बिकने की  कीमत बन जाए
और
बंद हो  जाए चोरों मुनाफ़ाखोरों के गोदामों में
अनाजों से भरी बोरियों की तरह
तब उसका तिरष्कार कर देना एकदम  उचित है ।
----------------------शिव शम्भु शर्मा ।



Thursday, 28 March 2013

मदनोत्सव



*******************
लो मदनोत्सव खत्म हुआ
आज से फ़िर वही सब कुछ झगडें फ़साद टंटे
फ़ब्तियां चुगलियां जुगालियां लाठियां और डंटे

गंगा नहाकर सारे पाप धो लेने के मानिन्द
फ़िर से  लौटकर आएगा
द्वेष मिटाने
हर बरस की मानिन्द
दुबारा
मदनोत्सव ।
-------------शिव शम्भु शर्मा ।

Tuesday, 26 March 2013

न जाने क्यो


सच की एक ऎसी ठोस जमीन पर खडा हूं
अकेला
यह जानते हुए अच्छी तरह
मेरे पीछे कोई नही आनेवाला

निहत्था हूं पथ पर
जबकि सामने है
हजारों झूठ
सच का तगमा लगाए
सच से भी ज्यादा चमकते
मुझे आईना दिखाते

अब ये आंखे किसी की चमक से
चुंधियाती नही है
न जाने क्यो ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Monday, 25 March 2013

रंग अलग अलग



**********************************
दलित टोले की होली अलग
वे पीटते रहते है अपना ढोल  झांझ मंजिरा अलग
उनका फ़गुआ अलग
रंग राग अलग

गरेड टोले कोइरी टोले यादव टोले
और ऎसे ही कुछ और भी टोले की होली भी अलग
फ़ाग अलग
राग अलग

सवर्ण और वैश्य टोले की होली एकदम अलग
इनके टोले में गाने बजाने आशिर्वाद लेने की पुरानी परंपरा
का बोझ अपने-अपने सिर पर लादे
सभी टोले को उनके टोले में जाना अनिवार्य है
वे अछूतो पिछडों के टोले मे नही आते कभी

ये टोले एक दरबार में मिलते तो है पर कभी नही मिलते
नही कहा जा सकता इस दासता को मिलना
नही कही जा सकती इसे होली
और न मिलन

सवर्ण टोले का कोई सिरफ़िरा भी दुनियाँ से गुजर जाए तो
शोक में डुब जाता है पुरा गाँव
पुरे गाँव की होली पर रोक

और दुसरे टोले का कोई सम्मानित भी गुजर जाए तो कोई
फ़रक नही पडता सिवा उस घर के और उसके गोतियां के घर के

आज भी गांव जवार की होली का रंग ऎसा ही है
यह पुराना रिवाज कही कुछ हल्का सा बदला तो है
मगर इसे बदलाव नही कहा जा सकता
और न होली

मैं होली में कभी भूलकर भी गाँव नही जाता
मुझे शहर की होली ही अच्छी लगती है

अच्छा लगता है यह  रंग अबीर गुलाल
जो एक दुसरे में
परस्पर मिल जाते है
भेदभाव  नही रहते

और नही भी मिले तब भी
किसी जातिगत सामंती बाध्यता की अपेक्षा तो कम से कम नही रखते

होली मुबारक हो आप सभी को ।
-------शिव शम्भु शर्मा ।

Sunday, 24 March 2013

लाँबियाँ


अपने अपने प्रांत की बोलियों बोलती  लाँबियाँ
दफ़्तरों में
कारखानों में

लगती है जैसे हो एक ट्रेन की ही बोगियाँ
ठहरती चलती अपने अपने प्रांत की ओर बस
केवल अपने क्षेत्र  की  ही सवारियों ढोती
अपने अपने प्रांत को आती - जाती

लोहे की गाडी  लोहे की पटरियाँ
और लोहे के लोग

और एक माटी का  देश
हर रोज जागता है लेकर जम्हायियाँ
लोहे के चने चबाकर
फ़िर सो जाता है
लोहे की चादर तानकर
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 23 March 2013

लोहा


लोहा लोहे से कटता है
आक्सीजन एसीलीटीन के गैस के ज्वलित दबाव से
कट तो जाता है पर उतना साफ़ नही कटता
जितना कि कटना चाहिये

हवा के आक्सीजन से अक्सीडाइज्ड होना
जिसे जंग लगना भी कहते है
इससे सड सकता है मगर कट नही सकता

कवि फ़ूल से लोहे को काटता है
कवि का लोहा लोहा नही होता
कुछ और होता है
जो भी होता हो हुआ करें
कवि जो मरजी वह किया करे

मगर इस सच को नकारा नही जा सकता
किसी भी तरह
कि फ़ूल से लोहा कटता है
और आज तक कोइ भी विश्वकवि लोहा नही काट पाया
और न पायेगा यह प्रमाणित है
इस देश का जंग आलूदा लोहा  कितना
चीमड है
सख्त है
जीवट है
गद्दार है
आज भी
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

भगत सिंह सुखदेव बिस्मिल की स्मृति में


भगत सिंह सुखदेव बिस्मिल की स्मृति में
*****************************************
चाहते हो अगर कि सर उठाकर जिये
और चलें फ़ख्र से सीना तानें
इस देश की सडक पर

तो मेरी दो बातों पर गौर करना ऎ ! मेरे दोस्तों
दो ही रास्तें बचें है केवल अब

या तो बनो सरकारी अफ़सर
या फ़िर  बनो कोई लीडर

चाहे जिस भी जुगत से या
जिस किसी बगुला भगत की सोहबत  से

मगर बनों तो यही दोनो में से बनो
चुनो तो यही दोनो में से कोई चुनों

इसके सिवा  कोई राह बची नही है यहाँ

कि बदल सकोगे तुम इस देश की दुनियाँ
और बचा सको अपनी ईज्ज्त व आबरू

अगर ऎसा नही कर सकते तो फ़िर लिखते रहो
उनकी तरह जो देश बदलने के लिये भूकतें रहे

लडते रहे फ़ाँसी तक पर लटक गए
और चले गए साहित्य रचते -रचते


मेरी बात पर यकीन न हो तो देख लो
अपने देश के साहित्य के इतिहास के पोथें
और इसकी उपलब्धियाँ

क्या हुआ  है आज तक ? लूट के चोथें
और
महज गाल बजानें के थोथें के सिवा ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Thursday, 21 March 2013

नदी

कविता सडने लगती है
उस तालाब की तरह
जो केवल
बारिश के भरोसे ही पडा रहता है

कवि भूल जाता है कि
कविता एक नदी है

और उसका बहते रहना
उतना ही रहना जरूरी है
जितनी जरूरी है भूख
दिन भर खटने के बाद की नींद
और वह प्यास  जिस  स्रोत से
निकलता रहता है पानी
निरंतर
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।


पैमाना


अभी परसों ही वह मिला था
अच्छा खासा था
आज अच्छा नही है

अजीब है यह
अच्छा और
खास होना
और हमेशा बने रहना

जिसे नापने का पैमाना
बाजार तय करता है ।

---------शिव शम्भु शर्मा ।


गर्मियां


फ़िर से आ गई गर्मियां
तेज धूप ठंढी कुल्फ़ियाँ

ठेलों पे लुढकती लस्सीयां
आम पुदीनें की पन्नीयाँ

बर्फ़िली शरबतें अनाप सनाप
फ़िर बिलों से निकलेगें साँप

फ़िर से  छोडने के लिये नये
केंचुल और
जहरीलें फ़ुफ़कार की भाप ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

प्रत्याशा




मैं  खडा हूं एक स्टेशन पर
पढ रहा हूँ चस्पाए वाल पर
एक चित्र युक्त कविता

कवि के शब्दों में शब्दचित्र है
छुपे बिम्ब  उभरते है मानसपटल पर
कुछ इस कदर कि
किसी और दुसरे चित्र की वहाँ
कोई जरूरत ही नही है शायद

फ़िर भी कवि चित्र लगता है
अंदेशा तो देखिये कितनी होती है आशा
और कितना छुपा होता है  डर
कितना प्यार कितनी प्रत्याशा

कि कोई निर्गुणधर्मी पटल छुट न जाए
कहीं बिम्ब बिना समझे ही रह न जाए
और कही उलझ न जाए उसकी कविता
अपने कथ्य की अन्तर्वस्तु से

सही सलामत पहुंच जाय  अपने मन्तव्य को
जबकि सही में ऎसा कुछ नही हो पाता
जितना कि होना चाहिये था

लोग मशरूफ़ है अपने अपने काम में और
चल पडती है ट्रेन अपने गंतव्य को
धडधडाती चलती रूकती हुई

इस बात से बेखबर
कि  मुसाफ़िर सोए है चादर तानें
फ़ुफ़ काटते
बिन्दास।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।




Sunday, 17 March 2013

क्यों है ?



मैं वह कलाकार नही हूँ
कि प्राण डाल दूं तराशे हुए पत्थरों की मूर्तियों में
और कह दूँ कि देखो यह ईश्वर है
और लोग अंधाधुंध  पूजने लगे
बगैर यह जाने समझें
कि ईश्वर कौन है
और है तो क्यों है ?

मै नही जानता आत्मा को भी
मैने इसे भी कभी नही देखा है
और जिसे अनुभव किया है
वह अवचेतन मन के सिवा कुछ भी नही है
यही तक मै अबतक पहुंच पाया हूं

मैं यह नही लिख सकता कि
सृष्टि से पहले भी मैं था
और आज भी मैं ही हूं
कल भी मैं ही रहुंगा

तुम नही समझ सकते मेरी बात
वो इसलिये कि तुमने अपनी आंखे बंद कर ली है

और यह मान बैठे हो कि
ग्रंथों में जो लिखा है वह सच है
क्योकि जन्मघुट्टी की तरह
यह अस्था तुम्हारे खून मे बहने के लिये छोड दिया गया है
हमेशा हमेशा के लिये

और तुमने सब मान लिया है
बगैर देखे बगैर समझे
मुझे माफ़ करना मै कलाकार नही हूं

एक अन्वेषी से ज्यादा कुछ नही मानता
खुद को
तुम नही समझ सकते मेरी पीडा
मेरे प्रश्न
मुझे माफ़ करना मेरे मित्रो ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

’मैं ’


मुझे चिढाता  रहता
यह कितना बडा उथलापन है या
कोई कुंठा अवसाद या मानसिक दिवालियापन है
अपना दुख औरो से कहते फ़िरते रहना
आखिर कौन सी समस्या के किस समाधान के लिये ?

क्या मेरी घुटन कम हो जायेगी ?
क्लांत मन निर्मल पोखर सा शांत हो जाएगा ?
आंखों का यह गीलापन खत्म हो जाएगा ?
अगर ऎसा होना होता तो फ़िर कोई  बात ही नही थी
मगर ऎसा होता कहाँ है ?

माना ऎसा हो भी जाए तब भी
मेरे लिये ही इतना जरूरी क्यो हो जाता है यह ?
यह बताने के बदले चुप क्यो नही रह सकता मै ?

यह सच है यह दुख बडा सालता  है
तभी तो यह मौन मुखर हो जाता है
शब्द अनायास फ़ुटने लगते है बेतरतीब

मेरे जैसे ना जाने कितने लोग अपना दुख किसी को नही बताते
निज विवेक से ही अपनी राह बनाते
दुसरो को प्रकाश दिखाते चलते है
फ़िर मेरे लिये ऎसा क्यो नही हो पाता ?
क्यो मेरा आत्मविश्वास दगा दे जाता है
क्यो निज विश्वास ही साथ छोड जाता है  मेरा ?

क्यो छिछोरा अहं आ जाता है सामने
यह निगोडा अहं बहुत जरूरी अंग है क्या ?
सरसों सी राई को तिल का ताड बनाता ?
मैं ऎसे क्यो जीता चला जा रहा हूं ?
वह कौन है जो मुझे अपने अधिकार से जीने नही देता
वंचित करता जाता रहता है

अपने अस्तित्व पर चढ बैठा शायद वही  ’मैं ’  हूं
इसी अबूझ ’ मैं ’ को जानना बाकी रह गया है
जिसे जानना सबसे पहले जरूरी था मेरे लिये
शायद यही है मानव का वह चेतन तंतु
जिसमे सब छुपा है
सब का सब
पुरा का पुरा
पृथ्वी और असीम ब्रह्मांण्ड का वह सच भी
जिसकी मुझे तलाश है
बेसब्री से ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 16 March 2013

मिलुंगा


नंगे पांव और खाली जेंब  लिये
मै जहा खडा हूं वहां से कौन सा रास्ता तुम तक पहुंचता है
यह नही जानता

पर यह जानता हूं खोज लुंगा वह रास्ता
जो तुम्हारी ओर जाता है

समय लगेगा मगर

तुमसे  मिलुंगा जरूर एक दिन
जुतें और राह खर्च के साथ ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

हरी दुबें


बरसात और ठंड के बाद इस बार

बलुअठ टीले पर कुछ हरी दुबें उग आयी है
पहली बार

अब गुनगुनी धूप तेज होने लगी है
धीरे- धीरें गर्म होने लगी है  हवाये

गुलमोहर की पत्तियां फ़लियां सूख चुकी है
जो फ़िर से खिल उठेगीं जल्द ही

मगर ये हरी दुबें  जल जाएगी
हमेशा हमेशा के लिये

और फ़िर से उजाड हो जायेगा टीला
उदास गुमसुम

नियति के खेल से रूबरू
और बेखबर
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 15 March 2013

भोर


आज की रात भी  फ़िर वैसे ही ढलेगी
जैसे ढलती आयी  है अब तक हर रोज
जैसे  गलता है बर्फ़ हिमालय का हर रोज
जैसे चाँदी सी चमचमाती बहती है सदानीरा नदी हर रोज
वैसे ही हम  फ़िर मिलेगें
भोर की सुखद हवा  के नई अनुभुति के साथ
शुभ रात्रि ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।


बाज़ार



**************
बाज़ार एक कठोर सच है
दुनियाँ का

विरासत मे मिली वर्ण भेद और
हैसियत से मिली अर्थ भेद
दोनो को एक अर्थ देने की
एक मात्र जरूरत ही नही है

एक रीढ है
लोथों  को खडा रखने की कवायद का आदमी नामा
विमुख नही रह सकते हम
इसके व्यापार से

समाज  विज्ञान साहित्य चाहे जो भी हो
उसे आना ही पडता है

हांके लगानें या खरीदनें
आखिरकर
बाजार में ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

रहने दो


बहुत कुछ देख कर जान चुके अब
हमें अनजान बने रहने दो

अपने गम से  ही  गुमसुम सही
हमें गुमनाम बने रहने दो

तुम कमा लो  सारे जहाँ की नेक-नामियाँ
हमें बदनाम बने रहने दो

तुम मनाओ हर रोज ईद दिवाली और होली
हमें केवल रमजान रहने दो

तुम बन जाओ अमेरिका लंदन औ ईटली
हमें तो बस हिन्दुस्तान रहने दो

मेरी मुफ़लिसी के सच से उठाओ न तुम यूं परदा
बस इतना सा इत्मिनान बने रहने दो

तुमसें बतियानें का अब कहाँ बचा रहा मेरा शऊर
उजडा ही सही मगर  मुझे
अपने  कब्रिस्तान में बने रहने दो ।
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 14 March 2013

खुदा


खुदा कोई निजाम नही है
कि किसी के कहने पे चला करे
किसकी दुआ  कुबूल करे वह जानता है
तुम्हारें गांव का वह हजाम नही है ।
--------------शिव शम्भु शर्मा ॥

कचरा



देखता हूं अक्सर
घंटों पूजा करती रहती हो तुम
ईश्वर के मंदिर में

यह सही है कि पूजा के लिये एक मुकम्मल जगह चाहिये
कचरें के ढेर पर रहकर पूजा का मन नही बनाया जा सकता है
अगर ईश्वर कचरे में नही रह सकता है

तो यह जान लो  यह भी  सच है कि
ईश्वर में कचरा भी नही रह सकता है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।


Wednesday, 13 March 2013

मैं


पुरी उम्र जग जीतने के बाद
अब उनके पांव कब्र में लटके हुए है
और खाट का चाँचर चिता पर रखा है

शनि का पुच्छला आखिरकर क्या है ?
क्या है ब्रह्माण्ड  ?
कहाँ तक फ़ैला हुआ  है ?
और क्या हैं पिंड  ?

यह सब जाने बगैर
एक पशु की तरह अज्ञानी से वे भी चले जा रहे है
अनजान पथिक की मानिन्द

और अब वे हो रहे है विलीन
उन्हें देखकर
शर्मिन्दा हूँ
मैं
------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

रद्दी


प्रोफ़ेसर की तरह मत पढना
फ़िलाफ़र की तरह भी मत पढना

रद्दी के सिवा कुछ नही मिलेगा तुम्हें
बस एक पाठक की तरह पढना तभी कुछ मिल सकता है ।
----------------श्श्श ।

चक्रव्युह


सुख भी स्वत: आता है जैसे कि आता है दुख

पर तुमने अपने सुख के लिये रच डाला चक्रव्युह
कुत्सित बिसात बिछा कर पाखण्ड साधकर

और जीत  ले गए केवल सुख
अपने दल बल के साथ बांध कर

और लाद  गए दुखों की मोटरी
हमारे माथ पर
कि इसके बोझ तले  दबकर मर जाए हम
घुट-घुट कर

पर हम मरे नही है - मान्यवर
लडखडा कर ही सही चल रहे है मगर
पीछा करेगें तुम्हारा उस समय तक

नियति के  चक्रव्युह के उस समय तक
जो तुम्हारें रचे व्युह से परे का एक  नियत चक्र है
जहां किसी का चक्र नही चलता

जिसे आज तुम न देख सकते
न समझ सकते हो
और न
रच सकते हो
- सुखांध कही के ।

Monday, 11 March 2013

सावधान !


तुम्हारें आर्तनाद और चित्कार पर
तुम्हारें टुट कर बिखरने पर
तुम्हारें आंसुओं के बहते रहनें  पर भी

कोई तुम्हारें पास नही आने वाला
कुछ झूठी रस्मी दिलासाओं के सिवा

तुम्हारा दुख केवल और केवल तुम्हारा है
तुम्हारा खास अपना
किसी और का नही

मत दिखा
मत बुला
किसी और को मेरे भाई

सावधान !
इस मोड से आगे का रास्ता बंद है
आगे मौत है और कुछ भी नही

इससे पहले कि चकराकर गिर पडो
बैठ जाओं  चुपचाप यही

आंसु कुछ थम जाए
तो लौट जाना अपनी देह में

मरना तो है ही आखिर एक दिन
इतनी जल्दी  क्या है ?
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

बोलना


जरूरी नही कि
अपने खुले जख्म खुलेआम बताए जाए
जरूरी नही  कि
अपने भीतर छुपे प्यार को खुलेआम जताए जाए

कभी जरूरी नही होता है
बोलना
सिवा इसके
जीने या मरने के लिये  ।
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 8 March 2013

मै प्रेम के खिलाफ़ नही हूं, मात्र निज अंत:--स्वार्थ युक्त अतिविशेष अतिरंजना के खिलाफ़ हूं ,जिससे किसी अन्य को कोई फ़र्क नही पडना चाहिये यह मेरी व्यक्तिगत सोच है ।

अहं


अहं विवेकहीन होता है
आंखों वाले अंधे की तरह

यह निर्णय नही कर पाता कि
क्या सही है क्या गलत ?
और क्या होना चाहिये ?

अहं में जिद अकडा होता है
अपना स्वार्थ जकडा होता है

सच जान कर भी आंखे बंद कर लेता है
शुतुरमुर्ग की तरह कभी-कभी

मात्र
स्वयं के सही होनें के सिवा
और कुछ नही देख पाता है

स्वयं का पक्षधर अहं
निष्पक्ष नही हो पाता है

यह सत्य से उपर चला जाता है
और
मित्रता को
सह्र्दयता को
चबा कर खा जाता है  ।
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 7 March 2013

प्यार करो पर


प्यार करो पर
अब इतना भी प्यार ना करो अपनी प्रेयसी को
कि शर्मा जाए पिता भाइ बहन का प्यार
लजा जाए उस माँ का प्यार

जिसने तुम्हें सबसे पहले किया था प्यार
और आज भी करती है उतना ही

तुम भी पिता बनोगे
और वह भी एक दिन माँ
बचा रहने दो अपने बच्चों के लिये भी कुछ
सब यूं ही लुटा दोगे तो बचेगा क्या ?

कुएं नदी समंदर की तरह नही हो तुम
कि बहता रहेगा सोता
उमडता रहेगा पानी हमेशा

सूख जाते है सोते
और समुद्र का पानी पीने के लायक नही होता
-------------------शिव शम्भु शर्मा ।

गुल


अब सुनी नही जाती
आवाजें उनकी

देखी नही जाती
मुसकुराहटें उनकी

जिनके महज दीदार के लिये
ठमक जाया करते थे लोग घंटो--पहरों

गुल खिला करते थे कभी
जिनकी रंगत को देखकर
गोया उनके चेहरें पे अब वो रौनक नही है ।
--------------------शिव शम्भु शर्मा

Wednesday, 6 March 2013

कविता का मतलब


अगर कविता का मतलब
एक गुलाब लेकर अपनी प्रेयसी को रिझाना
उसके विरह में विलाप करना है

अगर
बेगैरत हुक्काम की ताबेंदारी चापलुसी करना
गुमाश्तें की तरह छतरी ढोना और कानाफ़ुसी करना है

तो नही लिखनी है मुझे ऎसी कोई कविता
कह दो उन्हें
जो शब्दकौशल शब्दचित्र और शब्दबिम्ब के चातुर्य
का हुनर रखते है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 5 March 2013

कविता


जिन्दा रहने की जद्दोजहद में
इतना समय कहाँ है
कि पढी जाए कोइ कहानी

उपन्यास की तो सोच भी नही सकता
किस्तों में इतना बांट लिया है
हमने खुद को ही

अमूमन हर रोज एक जिन्दा कहानी
धारावहिक उपन्यास की सांस लेती किस्तें

चीखते छटपटाते और मरते
आदमी को अनायास देख लेता हूं

गलियों  चौराहों नुक्कडों बाजारों पर
भीख मांगते बच्चें स्त्रियां बूढों को
रिरियाते आदमी को
मुंह छिपाती  औरतें और
फ़िकरे बाज मनचले निठल्लों को

अब कहां कहां
क्या-क्या बताउं ?

क्या- क्या है या नही है  क्या होना चहिये क्या नही
यह   तय नही कर पाता
अपनी आंखे बंद भी कर लूं
तो कान का क्या करूं

और क्या करूं उस मन का
जो वह विवश कर  देता है सोचने को

बस किसी तरह पढ लिख लेता हूं कोई कविता
यही बहुत है
इसमे ही समय कम लगता है
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।

अजनबी



****************
वसुधा पर कोई अजनबी नही है
सभी की  एक पहचान है
सब के सब हमारें कुटुम्ब है

वसुधा के मानव प्राणी मात्र ही नही हैं
सब हमारे ही भाई -बहन हैं

तभी तो कहा जाता रहा  है -- वसुधैव कु्टुम्बकम

इन्ही कुटु्म्बों में से दो कुटुम्बों ने
दखल कर रखा है हमारे बडे -बडे भू खण्ड

और लील रहे है बेकसूरों को
बोकर बारूदों का जहर
ढा रहे है कहर

ये अजनबी तो नही है मगर
अजनबियों से भी गये गुजरे हैं

इन्हे हम क्या कहे ?
और क्या कहे तमाशबीन बनें स्वयं को भी ?

यही नही
न जाने कैसे ये वसुधा के  कुटुम्ब ही रचाते है
आपस मे शादियां
भाई-बहन का रिश्ता भूलकर

यह वसुधैव कुटुम्बकम कही हाथी का बाहरी दांत तो नही है ?
जो केवल हमारे ही पास है

कही हम ही एक महान तो नही है पुरी वसुधा में ?
या सच कुछ और है ?

जो शायद कही गुम हो गया है
अजनबी की किसी परिभाषा में ?
या किसी कौटुम्बिक रिश्ते की
कायर कातर आशा में ?
--------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 4 March 2013

अजनबी


अजनबी ही होता है वह
जो चलते-चलते राह पर गिरे आदमी को उठाता है
अजनबी   वह भी होता है
जो उस बेसुध का बटुआ उडा ले जाता है

अजनबी ही होते हैं वह
जो भगदड में रौंद कर अजनबियों की जान ले लेते हैं
और पलट कर भी नही देखते

अजनबी ही होता है वह भी
जो खचाखच भरी भीड में खुद उठ कर किसी असमर्थ को बैठने की जगह देता है

अजनबी ही होता है वह
जो ट्रेन से धकिया कर कमजोर बुजुर्ग दंपति को नीचे फ़ेंक देता है
इस बात से बेखर कि गिरने वाले का क्या हुआ ?

अजनबी ही होता है वह
जो खून से लथपथ छटपटाते को देख कर एम्बुलेंस मंगवाता है
अजनबी ही होता है वह भी
जो यह माजरा देखकर कतरा कर निकल जाता है

अजनबी ही होती है कभी वह भी
जिसके साथ  पुरी उम्र कट जाती है
और पता भी नही चलता

अपनी सी वह भी अजनबी ही होती है
जो सारी उम्र तिल तिल कर मरनें को छोड जाती है

अजनबी ही होते है वह भी
जो  खून के रिश्ते से अपने सगे होते हैं
जो किसी मातम या संकट की घडी में झाकनें तक नही आते हैं

इस अजनबियों और अपनों से भरी दुनियां में सबसे पहला अजनबी मैं हूं
जो आजतक नही जान पाया कि असल में अजनबी कौन है ?
मै ?
या फ़िर मेरे बाद की यह पुरी दुनियां ?
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।



Sunday, 3 March 2013

अजनबी



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भीड बहुत है
शोर  बहुत है

कुछ कह नही सकता
कुछ सुन नही सकता

सर दुखने लगता  है
मन कराहता है

इसलिये नही कि एकांत नही है
इसलिये नही कि मन शांत नही है

बल्कि इसलिये कि अपनो परायों
और अजनबियों के बीच
मैं कितना बेबश हूं

कितना अकेला

और स्वयं कितना
-अजनबी ।
----------शिव शम्भु शर्मा ॥

Saturday, 2 March 2013

स्तनपायी


न मैं तुम्हें देखता हूं
न तुम मुझे

न मैं तुम्हें समझता हूं
न तुम मुझे

हमारें तुम्हारे बीच के आदमीयत
के रिश्ते से पहले का
एक रिश्ता जरूर है

वह यह कि हम दोनो ही
जानवर हैं
अलग--अलग---स्तनपायी ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।


भलमनसी



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किसी अनजान सडक पर
चलते-चलते
जब आगे पीछे कोई गाडी नही हो

तब मेरे मित्रों को सडक के बीचों बीच
गाडी चलाना बुरा नही लगता
उन्हें इसमे मजा आता है

बुरा मुझे लगता है
नियम हर हाल मे नियम होता है
इसमे  छुपा होता है एक अर्थ

क्या पता कच्ची या पक्की कोई दुसरी सडक
नब्बे के अंश कोण पर आ मिली हो
पॆडों झुरमुटों की कतारों की आड मे छुपी
और चला आ रहा हो कोइ अजनबी
अचानक
कुछ भी हो सकता है

एहतियातन मेरे विचार
मेरे मित्रों से कभी कभी नही मिलते

कई बार विचारो के नही मिलने पर भी
हम अलग नही होते

इसका मतलब यह तो नही होता
कि मित्रता ही समाप्त कर दी जाए

अलग -अलग सोच और वाद के लोग भी
साथ- साथ चल सकते है

जरूरत  है बस केवल एक
भलमनसी की
जो समझ सके
एक भलमनसी को

इतना ही बहुत है
मित्रता  के लिये
-------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 1 March 2013

शोर


हमारे पुरखें जैसे भी रहे हो पर
शरमायादार थे

तभी तो बची हुई है आज भी
शरम ओ हया थोडी- थोडी

वरना ये नए सफ़ेद पोश
सफ़ेदी उतार कर

नंगई का नाच नाचते
और इनके गुर्गे

ताली बजा-बजा कर
हराम के शोर से खराब कर देते हमारा जीना

यह दिन देखने से पहले
हम अपनी आंखे बंद कर लेते

और सागर के  किनारे ठहर कर
नम हवाए खा रहे होते
--------------शिव शम्भु शर्मा ।

पुरस्कार



ये निगोडा पुरस्कार न हो तो
शायद कोइ साहित्यकार भी न हो

बडी मुस्तकबिल है यह चटनी
अगर यह निगोडी न हो
तो शायद कोइ चाटुकार भी न हो
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

ज्वार


रोज रोज कविताए लिखना
कोई रोग
या कोई लत नही है

एक ज्वर है
एक जूडी ताप का ज्वर

जो चढता है ज्वार की तरह
बहा ले जाता है समेटकर

खर पतवारों  को साथ -साथ
अपने संग -संग
वह सब कुछ
जो सामने होता है

एक भाटा है
जब उतरता है
तब रह जाती है प्रतिपल
तरंगो की हिलोरों की शक्ल बनकर
अनवरत
सांसो की तरह

और शांत हो जाता है तब मन
समुद्र तल की तरह
बिल्कुल
प्रशांत ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

आनंद


स्वच्छंद सा एक
आनंद छुपा रहता है

मनचाही पढने
और  लिखने में

खुद के लिखने के बनिस्पत
ज्यादा तवज्जों देता हूं

लोगो की कृतियां पढने में

फ़र्क नही पडता कुछ भी
एक समान सा
सुकून  दोनो में है ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।