स्वागत है आपका ।

Monday, 31 December 2012

नया सवेरा कब आयेगा ??


***********************
यह साल अंत में रौद कर
हमे डंसता  हुआ जा रहा है
इस भयंकर बियावान-सरीखे से हुए जा रहे देश से
कभी नही लौटने के लिये

तुम्हे अलविदा कह कर भी
यह टीस नही जा पा रही है
रह रह कर उठती है हर रोज
और तुम लौटती रहती हो
क्यो कम नही होती है किसी भी तरह
यह मर्माहत व्यथा समझ नही पाता

क्रुरता  पैशाचिकता ऎसी ?
कि पशु पिशाच भी सहम जाए
लडकी होने की इतनी बडी सजा
इतना घोर जघन्य अपराध ?

इसी देश के मूल की वैज्ञानिक लडकी दुरस्थ देश से
अंतरिक्ष में जा सकती है और
इसी देश की राजधानी मे एक लडकी अपने घर तक भी
नही जा सकती है

बुद्ध गांधी का यह देश क्या देश कहा जा सकता है ?
जहां ऎसी सडी गली नकारा सरकारें चलती हो
जो सिफ़ारिश कर फ़ांसी के अभियुक्तों को बचाती हो
एक अंधेरे युग के बूचडखाने की तरफ़ बढ रहा है देश
और जनता का सडक पर प्रदर्शन मांग लाजिमी है

निरूत्तर हो जाता हूं इस व्यवस्था पर ---

मै धन्यवाद देता हूं मीडियां को और उन तमाम देशवाशियों को
जो आज तक इस क्रूरता के खिलाफ़ आवाजे उठाये चल  रहे है
और प्रार्थना करता हूं - उस दिवंगत आत्मा और अभिशप्त परिवार
को ईश्वर शांति दे ।
अलविदा दामिनी !  ।----श,श, शर्मा ३१/१२/२०१२

Friday, 21 December 2012

गधे

 कुछ नही कहते
धोबी की मोटरी लादे चलते
या कुम्हार की मिट्टी लादे मचलते
जब कडाके की ठंड हो
या झुलसाती धूप हो
जब बरसती है लठ्ठ
तब भी नही रेंकते
गधों का रेंकना दरअसल
एक अजूबा है ।
---------श्श ।

टिन के कनस्तर

गर्म लाल टिन के कनस्तर हैं -हम
पलक झपकतें ही फ़िर लौट आते है -हम
अपनी पहली रंगत पर

अच्छी समझ है हमारी
अपने और बेगानों की संगत पर

हम फ़िर बांचने लगते हैं अखबार
टीवी* पर देखने लगते है नया समाचार
सोचते है---- हम नही 
इसके लिये तो जिम्मेवार है सरकार

यूं फ़िर चलता रहता है
बलात्कार दर बलात्कार
वही चीखें वही आर्त-- चित्कार

अफ़सोस हम जुडकर तवें नही बन पाते
के जिससे बन पाये कुछ अदद रोटियां

तब भी जब
पाशविकता भी करती हदें पार
सरेआम लुटती हैं अस्मतें
मसली जाती है कलियां

मौत से गर बच भी जाए तो क्या ?
मुसर्रत से जी सकेंगी कभी ये
विक्षिप्त बेवश मजलूम
हमारी ही बहन व बेटियां ?

वासना सर्प बना फ़ुफ़कारता है
डसता है और
मजे लेकर चला जाता है
ढूढंने फ़िर से कोई नया शिकार

शहरी घरों मे बची है अब पार्टियां
याद आ रही है गांव की वह लाठियां ?
जो
केवल सर्प की शिनाख्त होते ही
टूटती है आज भी
अफ़सोस व इंतजार के सिवा अब
किस काम की है ऎसी चौपाटियां ॥
--------श्श

Tuesday, 4 December 2012

ठंड


दस्तक देती ठंड
अब पसर चुकी है
सडक पर
देर तक टहलने वाले लोग
आज नजर नही आए
धरों में दुबक गए हो शायद

खामोश सन्नाटा और अकेलापन
फ़िर आ धमके मेरे पास
न जाने कैसा कब का नाता है
इनका मुझसे
चिर सखा रहे हो मेरे जैसे

कितना पास लौट आता हूं मैं
अपनों के पास आकर अकेले

नही समझता पाता  आज भी
कौन सी अनजानी इच्छा के अधीन
कौन सी भूख के वशीभूत

इस अंतहीन सडक पर चलता हुआ
जैसे कोई बिछडा करता हो अपनों की तलाश

अचानक
एक विदेशी कार अपनी तेज रौशनी से चौधियां कर
धकियातें फ़र्राटें भरती निकल गई
देह को एक देह से ढंके  वह कारवाला
शायद इस शहर में आदमी कहा जाता हैं

बचते बचाते आंखे मलता
मैं रह गया बस उसे देखता

----" बाबूजी कहां जाना है " ?
------" यह कौन है " ?
सूने से अंधेरें में
---इस कडकडाती ठंड में भी ?
---------मेरी ही बिरादरी का वह कोई रिक्शेवाला था
भूखा अधनंगा अदना सा एक दोपाया
जो गिना नही जाता कभी आदमी में
और
जिसकी पेट की आग के समक्ष
नतमस्तक  हो जाती हैं ठंड

मेरी खुली नंगी आंखें
जिन्हें ढँक नही पाया मैं  कभी
किसी विदेशी चश्में से
अब
न जाने  कौन सी परिभाषा का अर्थ टटोलती है ?
और
क्यो रह जाती हैं अकेले ?
बिल्कुल बेपरवाह इस
कडकडाती ठंड से भी ...।
---------श्श

Thursday, 29 November 2012

घबराना नही


जब कोई पसंद न करे आपको
अपने भी  साथ छोड जाय आपका
खुद की आंख के आंसू भी बहने से दगा दे जाय
किसी भयंकर विपदा और संकट की घडी मे भी
जब चारो ओर घटा टोप अंधेरा हो
अपना हाथ भी साथ देने से मना कर जाय

तब भी
दुखी होकर घबराना नही मेरे भाई
ये हालात एक आनेवाले वरदान का संकेत है
याद रखना
अंधेरी सूखी नदी के उस पार
कोई इंतजार कर रहा है तुन्हारा
खडा है --केवल तुम्हारे लिये
जिसके पास हैं ---एक नया सवेरा ।

--श्श्श

डेंगु का ज्वर


अब लगभग नही सुनाई देता कही से
मुक्ति दुष्यंत शमशेर धूमिल बाबा अदम जैसों का स्वर

समृद्ध हो गये गये है कितने हम अब
भूख से मरता  नही कोई अब
अनाजो से भरे पडे है गोदाम
भीख नही मांगता कोई बच्चा अब
नही बीनता घूरे से कचरा कबाड अब
नही लुटती है अब किसी गरीब की अस्मत

अब नही सुनाई देता कही से वह जनवादी स्वर
कितने खुशहाल है हम अब
पता नही कहाँ से आ गया यह डेंगु का ज्वर
 ------------------श्श्श

Tuesday, 27 November 2012

अहिर्निश समुद्र ।


समुद्र तट पर
अबोध बच्चें
और उन्ही की तरह के लोग
मुफ़्त के बेशुमार बिखरे  रेत पर
उछलते कूदते खेलते
बनाते हैं
सपनों के अपने-अपने धरौदें

रेत मुफ़्त की नही होती
कई बडे पत्थर अपना सीना तोडकर चुकाते रहते है मूल्य
लगातार लुढकते टूटते और बिखरते रहे है सदियों से
संग-संग  बहते जाते है नदियों से
तब बनते हैं रेत ---समुद्र जानता है

एक बडी लहर आती है
सारे घरौदे समेट ले जाती है

बच्चे कहां समझ पाते है ? लहरों का आमंत्रण !
और जारी रहता है यही खेल

कैमरा लटकाये घुमते
कुछ बच्चे अपनी उम्र से पहले ही सयानें हो चले है
अपने बनायें घरौदों का खीच लेते हैं तश्वीर

लिख देते है उन पर अपना नाम और पता
और लगा देते है एकस्व स्वामित्व की मुहर

नाम तश्वीर से बडा  होता है
कही भूल-चूक न हो जाय
इसलिये पता भी होता है

इन बेशुमार तश्वीरो की किताब के  नाम का एक बाज़ार है
जहां दुबारा छापी जाती है तश्वीरें
कीमतें लगायी जाती है
होता है मूल्यांकन
और बाँटे जाते है पुरस्कार

नाम की निगोडी यह लालच ही कराती है चोरियां
टूटती हैं तिजोरियां
चोरों के घर भी होती है चोरियां

इन तश्वीरों से भरी जाती है बोरियां
सील मुहरबंद लाह से जिसके मुँह पर
लिखा होता है --काँपी राइट एक्ट के अधीन सुरक्षित

मुफ़्त की हवा पानी खा पीकर
महज एक शक्ल देने की एवज में
नाम की इतनी बडी कवायद मे कही कोई अर्थ बचता है क्या ?
नाम से बडा कुछ नही होता क्या ?

देखता इस व्यापार में डूबते उतराते
कृतध्न मनुष्य को
और ठठा कर  हंसता हैं ---अहिर्निश समुद्र ।

Monday, 26 November 2012

सच बोलना ,,


इतिहास भूगोल गणित विज्ञान वगैरा वगैरा
क्या तुमने लिखा था ?
चलना फ़िरना लिखना पढना कमाने लायक बने तुम
क्या तुमने खुद से सीखा था ?
सच बोलना ,,,
आज एक दोयम दर्जे की भाषा में
कविता लिखकर कहते हो कि मेरी है
कितने बेशर्म हो तुम ?
सच बोलना ,,,
इस पुरी कायनात को लिखने वाला तुमसे कब कहने आया
कि यह मेरी है ?
शर्म नही आती तुमको स्वयं को कवि कहते ...
सच बोलना ?


ये हाइकू क्या है ?


एक सच
----
मैने एक जापानी से पूछा
----ये हाइकू क्या है ?
----और इतना छोटा क्यो है ?
जापानी ने बताया--
हमारे देश मे काम करना सबसे उपर है
लफ़्फ़ाजी का नंबर सबसे नीचे है
---लंबी कविता लिखने में
और उसके पढे जाने मे
बहुमूल्य समय बरबाद न हो -इसलिये हाइकू है ।
---श्श्श ।

समुद्र तट पर



**********************

एक लडकी रूठती है
एक लडका मनाता है
फ़िर
लडका रूठता है
अब लडकी मनाती है

उन्हें देखकर एक कवि  अपनी कविता साधनें
रोज-रोज तट पर  आता है
प्रेम के बीच की बारीकियों को
टांकता है--- कागज पर
अपने शोध का विषय बनाकर
सोचता है
वह प्रेम के एक नये अंश का काव्य लिख रहा है

सदियों से जारी यह खेल कोइ नया नही है
और इसपर इतना कुछ  लिखा जा चुका है
कि और कुछ भी लिखने की गुंजाइश नही है
---------गंभीर समुद्र यह जानता है

अन्जान कवि  कविता में अपनी प्रेयसी को निहारता है
और समुद्र --अपने तट को

---ये दोनो नही मानते

न समुद्र मानता है
न कवि मानता है

-------उपर खडा चांद मुस्कुराता है
--वह दोनो को जानता है ।
-----------श.श.श..

Saturday, 24 November 2012

दुर्गंध


मच्छी बाजार की सडांध का भभूका
नथूनें को सिकोड देता है
मजबूर करता है
रूमाल रखने के लिये
अन्यथा हटने के लिये

शोंर भरें बाज़ार में
भूख से जूझते  अभ्यस्त लोग
नही हटते दुर्गंध सें

रोजगार मे छिपा भूख ही तो
हाकें लगाता
मोल करता

तराजू बाट लिये बैठा रहता
तौलता है भूख को भूख
किलो के भाव से
और बदल देता है
दुर्गंध को एक लजीज
सुगंधित व्यंजन की खूशबु में

Friday, 23 November 2012

लत


लत कैसी भी हो
लानत है
अच्छी भी हो सकती है
और बुरी भी
उन्हे देखने का जज्बा
उन्हे मोडने का कब्जा
अगर हमारे हाथ में हो

नही हो सकते हम किसी लत के शिकार

Saturday, 17 November 2012

मुफ़लिसों से भरें वतन में


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ऎसा नही है
कि दशहरें में रावण को पहली बार जलाया
हर बरस ऎसा ही होता है
रावण मरेगा नही कभी
रावण अमर है

ऎसा यह भी नही है
कि दिवाली में दीप पहली बार जलाया
हर बरस ऎसा ही होता है
अंधकार मिटेगा नही कभी
अंधेरा अजर है

फ़िर क्यों नही समझते गरीब देश के लोग
भ्रष्टाचार के बाद इस देश के
त्यौहार दुसरे बडे अजगर है
क्यों बाते करते हो आकाश की उजाले की और बे मरम्मत घर है


स्फ़ुर्ति ताजगी के लिये तो काफ़ी एक अवसर है
दिखाना ही है तो दिखाओ किसी दुसरे अमीर देश को
अपनों के बीच अपने को ही दिखाना क्या यही शेष भर है ?

त्यौहार सादगी से भी मनाये जा सकते है
अरबों खरबों जलाने से बचाये जा सकते है
कोई परंपरा नष्ट नही होगी आखिर किस बात का डर है ?

बहुत हुआ रहम करो अब कही ऎसा न कहे कोई
के मुफ़लिसों से भरें वतन में खाली डब्बों के सर है ।
------------------श्श्श

Friday, 9 November 2012

ओ चंचला !


तुम्हारा प्रेम भी
अहसान जताने के दायरे की
एक छोटी सी डीबियां में बंद है

बिल्कुल उस दान की तरह
जिसे किसी मंदिर के प्राचीर पर
संगमरमर में
कैद करवाता है  दाता
अपना नाम

नाम के फ़ेर मे तुम नही जान पाओगी

उन लोगो को जो चुप रहकर
करते रहते है - प्रेम
बिना जताये किसी को बताये
किसी  गुप्तदान  की तरह
निर्बन्ध

ओ चंचला !
तुम नही समझ पाओगी
चुप्पियों के हृदय में छुपे
उस उन्मुक्त प्रेम को
नाम की कैद से परे
उस श्रम को जो
देखता है
समझता है
दया और करुणा के
बीच का अंतर ।
---------श्श्श..!

Tuesday, 6 November 2012

आईना


झूठों की लम्बी कतार में
वाह वाही के सिवा
जो नही सुन सकते
सच
आलोचना
और
निचोड
अपनी रचना के विरुद्ध

जरूरी नही सभी आईने
समतल दर्पण  हो
उत्तल
अवतल भी हो सकते है

जो नही देखते आईना
जीते तो वे भी है
फ़िर जरूरत क्या रही होगी
कुछ रचने की  ??

Sunday, 4 November 2012

दवा


माँ अब उंचा सुनती
बिस्तर पर सिकुडी
रहती
खांसती भी है

खंखार से बहुयें होती
अब खूंखार

बहुओ को खांसी की
दवा पता है
किसकी बारी है आज
जरूरी यह  है ।

Thursday, 11 October 2012

नजरों में आपकी एक गडबडी जो है


कोई फ़रक नही पडता हुजुम में
शमिल रहने या नही रहने से
आपको तो मतलब है बस
केवल शहद से
भला मक्खियां आप कैसे निगले ?
नजरों में आपकी एक गडबडी जो है
वह भी यूं ही तो नही है
केवल गड्ढा दीखता है आपको
और
गड्ढें के पास ही पडी
खोदी गयी मिट्टी की ढेरी
नही दीखता आपको
ठोकरों से जिसे अंधे भी  देख लेते है
नजरों में आपकी एक गडबडी जो है
------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 10 October 2012

मुफ़्त दुकान





क्या किताबों का पता पूछा आपने साहब ?
मुझसे.. ?

सरकारी अस्पतालों मे चले जाइये फ़िर
वहाँ हर बेड पर पडी
अलग अलग किताबें मिलेंगी ! साहब
हर रोज नयी-नयी प्रकाशित
लोकार्पित
कुछ जमीनों पर भी पडी मिलेंगी
आग में झौस दी गयी चित्कार कभी सुनी है आपने ?


चुपचाप बोलती सिसकती कराहती चित्कारती
जिन्दा अधमरी और मरने के कगार पर की कवितायें
चिताओं के अंगार पर की कवितायें
क्षणिकायें रिपोर्ताज और मुक्तक
क्या-क्या चाहिये आपको
बिखरे पडे दोहे चौपाईयां
सब मिलेगें
ढेर सारी कहानियाँ

डाक्टरों कम्पाउंडरों की गजलें बामुलाहिजा उम्दा शेर
अंदाजे बयाँ नर्सों की खनकती रुबाईयाँ
कविताओं की किताबों की खालिस मुफ़्त दुकान

किसने कैसे लूटा है कहाँ से
किसका का पैसा
कहाँ गया कहाँ का पैसा
कैसे छिपा बैठा है यहाँ पैसा
देखिये  कैसे खनकता है यहाँ पैसा
कैसे मचलता है रिरियाता है यहाँ पैसा
कैसे बनता हैं यहाँ पैसा
कैसे उजाडता है यहाँ पैसा
कैसे अंगार में जलता है यहाँ  पैसा
और कैसे रोता विलखता है यहाँ पैसा

मन भर जायेगा  आपका साहब
अघा जाओगें
पढते-पढते
एक साथ
देखते-देखते
अकबका जाओगे
नयन पट खुल जायेगें

कहाँ भटकते हो इन बनियों के पुस्तकों के मेले में ?
ख्वाहमख्वाह फ़िजूल पैसों के झमेलें में ?
वहाँ तुम्हे क्या मिलेगा ?
कही का कोई एक बना बनाया वाद गुट बहसबाजी
लफ़्फ़ाजी के वैचारिक व्यापार के सिवा
क्या करोगे उन कागजी पूलंदों के
फ़फ़ूंदो के
मकरंदों के ज्ञान का ?

क्या रिश्ता रहा है आजतक ? बतलाओ
इन गरीब दलित पीडित उपेक्षित
मसली कुचली जली
बेड पर पडी
खुली
अधखुली
किताबों का

तुम्हारे उस विश्व प्रसिद्ध पुस्तकों के
गोष्ठियों सम्मेलनों  का ?
मेलों के महान ज्ञान का ?
तुम्हारे बनाये संविधान का ?
तुम्हारे बनाये इस जहान का ?

---------शिव शम्भु शर्मा


Wednesday, 3 October 2012

रोज रोज ।


रोज रोज ट्रेन का सफ़र
रोज रोज की बरसात
रोज रोज
कविता भी
अच्छी नही लगती
है एक और भी दुनियाँ
जहाँ कुछ नही होता
रोज रोज ।

Sunday, 12 August 2012

मौत



भूख
रुदन
आह
कराह
आँसू
बेबशी लाचारी और मौत
के बीच  खोजता हूँ
कुछ कविता जैसी
मुलायम सी कोइ मरहम
कुछ नही मिलता मुझकों
हो जाता मैं खाली हाथ
पुस्तकालयॊं की रेकों
पर पडी मिलती है
बेसुमार कवितायें
और
पुरस्कृत कवि
क्या करुं मै इनका ।

Friday, 20 July 2012

उम्मीद



----------------
ओ पर्यटक !
आ गये तुम तस्वीर खीचने
आओं देखो 
उम्मीद के बिना भी कई पेड खडॆ है
औधे भी पडे है तो क्या ?
वैसे ही झुमते रहते हैं
झुम जाते हो जैसे तुम 
अपनी अतिरंजना से
आँखों में हरियाली की उम्मीदें पाले
पर वह
तुम्हारे देखने से बेपरवाह
बरसाती नदी की तलहटी में पडे
उस बडे चट्टान की तरह ही है 
अपरदन और दरारों से बेखबर
जो उसकी अपनी नदी ने ही दिया है
आत्मज्ञानी नही है वह तुम्हारी तरह
उसे संसार नही चाहिये
मोक्ष भी नही चाहिये
वह तो तुम्हे चाहिये ?
कितनी चाहतो से भरे हो तुम
कुहरे के पार का भी स्वर्ग तुम्हे ही चाहिये
जिसे किसी ने नही देखा
कुछ पाखंडियों और
तुम्हारे सिवा ।
---------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 15 June 2012

परवाह

तपती झुलसती गर्मी से बेचैन
रातों को ठीक से नही सो पाने
पंखे की गर्म हवा की शिकायत
और घमौरियों का रोना रोते

ग्लोबल वार्मींग  पर्यावरण
पर जीवन व पृथ्वी के लिये 
गंभीर चिन्ता प्रकट करते
शाम की उमस में अनुपयुक्त कुलर
और एसी के महत्व की बात
आपस में बतियाते 
बहस करते 
टहलते चले जा रहे थे 

सुबह बरसात की पहली हल्की
बारिश की बुँदा- बाँदी में
वही लोग भीगनें के डर से
रेनकोट और छतरी तानें
ड्युटी जा रहे थे

मैं भींगता जा रहा था
उनको देखता
मौसम कैसे बदलते हैं
और 
क्यों परवाह नही करते
किसी का ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Wednesday, 6 June 2012

मुखालिफ़

बहुत कठिन होता है
सच बोलना तब
जब सामने कोई
अपने जैसा होता है
वाह वाहियों के झुठे कसीदे
बोलना और
कतरा कर आगे निकल जाना
कितना आसान होता है
किसी को फ़ुलते फ़ैलते छोडकर
गुमराह कर जाना
कितना सरल होता है
पर
तब खुद को बहरुपियां बनते
कोई देख रहा हो जैसे
ऎसा भी लगता है
और फ़िर तब
उससे नजरें नही मिला पाता जब
विवश होकर
उसके लिये ही
यह जानते हुये भी कि
तकलीफ़ बहुत होगी फ़िर भी
बोल देता हूँ वह सच
जो कडवा ही सही कुछ पलो के लिये
और
परिणाम जो भी हो मेरे लिये
तब मुझे सही लगता है सच बोलना
मुखालिफ़ होकर भी
जो बोल देता हूँ ।
---------शिव शम्भु शर्मा

Wednesday, 23 May 2012

प्रतिक्षा


सूखी घास
पसरी जमीं थी
आपकी कमी थी
एक ऎसी नमी थी
जिसकी कोई सरज़मीं नही थी 
एक आतंकी विस्फ़ोट के बाद की 
पहली पैसेंजर जैसी सहमी थी
जिसमें कोई चहलकदमी नही थी
एक प्रतिक्षा थी
जिसमे गलतफ़हमी नही थी
एक तितिक्षा थी
जिसमे कोई मेंहजबी नही थी
एक प्रतिछाया थी
जिसमें कोई काया नही थी
एक उपेक्षा थी
जिसमे कोई छाया नही थी
एक पराया नुमायाँ  थी
जिसमें कोई अजनबीं नहीं थी
-------------------------शिव शम्भु शर्मा ।


Friday, 13 April 2012

नश्तर ।


उडतें जाते  भागते फ़डफ़डातें सालों से परिन्दें
तेज आँधी सी हवाओं के उठते बगूलों से सनसनातें शोर में
कैलेन्डर के पलटतें पन्नों की तरह
सिहरता जाता  है कोइ अकेला
देखता नीला आसमान
फ़िसलती जाती जिन्दगी के मायने भी
हाथों सें
हसीन रेशमी ओंढनी के डोर की तरह
थमती हवाओं के बाद का सन्नाटा 
जीने का अर्थ कितना मँहगा हो गया अब
अंधेरी रात का विलाविलाता अंधेरा कितना गहराता सा जा रहा
है खडा भौंकता अन्धा आवारा कुत्ता कोइ बेसुरा
सडती कब्र के  सायें के साथ होनें का एक अहसास दिला जाता है 
रात के कहर में मेरे साथ 
वह भी खोजता है भूख की जिन्दगी के मँहगे अर्थ का अर्थ
सन्नाटों को डराता गुर्राता फिर पसर जाता
झींगुरों की झंकारों की पसरती आवाजों की तरह
रात से चिंगुरतें अंतिम पहर का प्रहरी तारा भी छुप जाता है
चाँदनी सी सफ़ेद बादलों के ओंट में
आवारा मरियल कुत्तें की गुर्गुराहट चिहुक उठती घूरें की धूर पर बेजान 
मंदिरों की घंटियों की आवाजों , अजानों के साथ 
थकी माँदी बासी मुँहलटकायें
फिर आ जाती है वही सुबह हर रोंज की तरह
पेट मे चुभोनें दिन भर के लिये
फिर वही नश्तर 
फिर वही नश्तर ।
---------------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 31 March 2012

दरख्त


मरना तो सबको है 
अब तक रहा है कौन ? 
कि हम रहेगे ?
मरने जीने की जद्दोजहद मे भी 
कहीं न कहीं 
साबूत सा बचा होता हैं 
एक मौन 
यह बचा मौन ही होता हैं 
शब्दो में छिपा कहीं 
बीजों मे छिपे दरख्त की तरह
यही बचकर कहता है  
हम बचे रहेगें 
--------------- शिव शम्भु शर्मा

भूसा


मैने माना तुम
फ़ार्म हाउस खरीद सकते हो 
तुम गेंहु उगवा सकते हो
रैलियां बुलवा कर भेडों सी भीड को बहला कर
नारें लगवा सकते हो
भाषणों मे कविता शेर के
जुमले फ़िकरे पढकर फ़ुसला सकते हो
तुम
गठबंधन की सरकार बना सकते हो
कानून बनवा सकते हो
रियायतें भी थोडी दिलवा सकते हो पर
ओ अमूल के बटर
जान लडाकर भी
तुम स्वयं गेंहु नही उगा सकते जिसे
केवल मैं उगा सकता हूं
थ्रेसर के उडते भूसों के गर्दो मे 
जहाँ 
कुछ ही पलों मे
सांसें तुम्हारी उखड जायेगी 
पानी से निकली मछली की तरह 
पर मै
वहाँ भी लडकर
लगातार खडा रह सकता हूं
फिर
अलग कर सकता हूं 
गेंहु को भूसों से 
जो तुम्हारे वश की बात नही है
मै भूसा होकर भी सांस ले सकता हूं
भूसा हूं सही पर 
दाता हूं तुम्हारा
यह मत भूलना 
देता हूं तुम्हें गेंहू 
ले लो फिर इसे बारीशों में फिर सडवा देना
भूखमरी पर हिट फ़िल्म बनवा लेना
अपनी मेम का और कुत्ते का ख्याल रखना केवल जो साथ देगी
तुम्हारें मुर्दा घाट जाने तक
ध्यान रखना केवल उसका जो सगा अपना हो
उसका कभी नही
जो तुम्हारे बंगले चमचमाती कार और चेहरे पर 
खिले खुशियों से दमकते गुलाब की लाली का
सार है

नमन

(भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, पाश की स्मृति मे)
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हर बरस बदलते दिवसों से आते तुम
आते-जाते दिवसों से फिर हो जाते गुम
बरस मे जितने दिन ना समाते
उतने दिवस अब हमने बनाये
ऎसा कोइ दिन न बचा अब
जिस दिन कोइ दिवस ना आये
दिवस युग्म भी बनते जाते
दिवसों मे बस एक दिखावे सा ही ध्येय बनाते
औपचारिकता की परिपाटी में बस एक प्रमेय सजातें
मेला भी लगता कहीं-कहीं
चढती मालायें गहीं-गहीं
दिखता नमन लेखो में भी
गुंथी जाती महज कथाएं
भाषणॊं ;
गीतों;
श्रद्धा की अंजुरियों से बस कहीं-कहीं ही होती चर्चाएं
त्याग वीरता बलिदानों से उपजीं
भारत माता अपनी भोली-भाली
लगती मुझको अब काली-काली
भ्रष्ट देसी अंग्रेजों के
चेहरों पर बहती रहती गंदी नाली
जिसमे पडें पलते कीडें पूछों वाली
जो लगते महज बस एक गाली
कहाँ गयें अंगरेज अभी तक
अजगर गिद्ध सर्प बने फ़िरते है
सफ़ेद रंगों के रंगरेज अभी तक
गंदा सडा नाली का पानी सर के उपर जब चढता है
तब जाकर बनता खबर हर कोइ जिसे देखता पढता है
घोटालों हवालों से लुटते जाते
गणतंत्र के अधिकार बताते
लडते- लडाते गठबंधन से
लूटने की सरकार चलाते
खून गरीबों का बेच यह स्वर्ण बनवातें
स्विस बैंक मे छुपे-छुपाते जमा करवाते
देश रतन अब बनते खिलाडी
नोटों पर केवल गांधी बाबा ही छपते
कितने बर्षो के बाद अब महज तुम सिक्को पर
छापने की एक सोच बने टकसालो मे आतें
नमन तुम्हे अब करने मे पाखंड
मुझे अब लगता है
सब देख- सुन कर चुप रहना
शायद यह मेरा भी एक मौन समर्थन ही होगा
कैसे कोइ शब्द करूं मै अंकन
कैसे नमन करूं अब तुमकों
तुम ही बतलाओं ?
लज्जा से दुखता सर अब झुकता
झुकता झुकता सा जाता है ।

गुलाम

रोटियाँ भी जल जाती है
मेरे भूख की तेज आँच से
पिघल जायेगें तुम्हारें
मोम के शेर
मेरी परछाई के धाह से
मेरे वजूद को भूल जाओं
अब आजाद  कर दो मुझे
अपनी पनाह से
घिसोगें मुझको तो
तुम्हारें हाथ जल जायेगें
मुझे बख्श दो मेरे आका
अब
मै अलादीन का चराग नही हूँ ॥
-----------------शिव शम्भु शर्मा