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Wednesday, 27 February 2013

लाहौल विला कूव्वत


उनके कविता संग्रह को
एक रस निकालने  वाली मशीन में पेरा
बस एक ही शब्द बाहर निकला
--प्रेम

कहानी संग्रह से निकला
---प्रेम जीवन है

और उपन्यास के संग्रह से निकला
--प्रेम समाज का जीवन है

इतनी बडी कवायद के खर्च का परिणाम निकला
बस ढाई अक्षर

जो एक फ़कीर संत मुफ़्त में दुनियां को बता कर चला गया है

मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला ---लाहौल विला कूव्वत ।
--------शिव शम्भु शर्मा ॥

Saturday, 23 February 2013

हम माटी के लोग

हम माटी के लोग 

पेट से उपर ही नही कभी पहुंच पाते 
और तुम दिल की बात करते हो ?

हम क्या जाने दिल और गुलाब
हम तो जर्रे है जमीन पर पडे हुए
हम क्या जाने कैसा है आफ़ताब ?

भूख ने कभी हमे चैन से जीने ही नही दिया
हम कैसे जमाए तुम्हारी तरह पैसे बेहिसाब
और पढे तुम्हारी मुहब्बत की किताब ।

बी पी एल का भी झटक लिया तुमने खिताब
अब इंदिरा आवास भी तो तुम्हारा ही बनता है 

रहने दो अब और न खुलवाओ अपना पंचनामा 
हम माटी के लोग है हमें माटी में रहने दो जनाब ।
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

चाहता बस इतना ही


चाहता बस इतना ही
**********************
उन्मुक्त रहुं परिन्दों की तरह
कभी इस डाल तो कभी उस डाल
कभी यहां तो कभी वहां

उडता रहुं जैसे उडते  धूल कण
पवन में

खिडकी से आइ
लकीर सी धूप में जो
देता है  दिखाइ

चाहता नही बंधना किसी बंधन में
चाहे वह प्रेम हो या फ़िर हो रूसवाइ

विचरता रहुं असीम गगन में या
यायावर सा घूमता रहुं निर्जन वन में

या रहुं खडा किसी समुद्र तट पर
लहरों से खेलता रहुं सदा

पडा रहुं  किसी चट्टान की तरह
होता रहुं मुलायम हर दिन
खाता रहुं थपेडें अन गिन


जाना पडे कभी अगर तो रोऊ नही
चाहता बस इतना ही
हंसते -हंसते हो मेरी विदाइ
-------------श्श्श।


Thursday, 21 February 2013

साकार


आप लिखते है ---
लेख कविता कहानी उपन्यास
बनाते है कार्टून
बनाते लिखते रहि्ये

छापते रहिये
छपवाते रहिये

बेचते रहिये किताबें
--लो दही लो दही
के हांके लगाते रहिये

कुछ बिक जाए तो
मगन हो जाइये फ़ूल कर कुप्पा-टुप्पा हो जाइये
और मान लीजिये कि आप है एक उम्दा साहित्यकार
और बटोरते रहिये  इसके एवज मे नाम के तगमें व पुरस्कार

अपना खून जलाते रहिये
अपना पैसा गलाते रहिये

कभी आपने यह सोचा भी है कि
आपका लिखा देखता पढता कौन है ?

---कुछ निठल्ले
---कुछ अधपगलाये
---कुछ यात्री
---कुछ शौकिया किस्म के लोग बस
---फ़िर सब फ़ुस्स.....

जहां तक जिन तक पहुंचना चाहिये वहां तक कभी पहुंच पाता है ?
---खैर छोडिये जाने दीजिये इससे आपको क्या मतलब ?

--सकारात्मक सोचते रहिये
साकार सोचने से सब प्रकार के आकार अपने आप साकार हो जाता है

अगर स्वयं के लिये लिखते है तो यह बहुत अच्छी बात है
मै भी तो यही कर रहा हूं फ़िर लिखते रहिये
मुझे भी यह अच्छा लगता है ।
-----------------------श्श्श ।

Tuesday, 19 February 2013

लंबी तान के न सोऒ


लंबी तान के न सोऒ
************************
सब लोग नही देख सकते
कभी  सभी को
मुनासिब नही है यह कभी

नही देखते तो क्या ?
नही समझते तो क्या ?

तुम चलना छोड दोगे
उस पथ पर
जिस पथ पर तुमने
चलने की ठानी है ?

पृथ्वी चाँद सूरज सितारे
कब किसकी परवाह करते है
चलते नही रहते है क्या ?

कौन रोक सका है उन्हे
जरा बताओ ?

ये अर्थहीन विषैले चमक के पीछे
बेतरतीब बेतहाशा दौडती भीड
नही समझती तो न समझे
तो तुम भी  समझना छोड दोगे क्या ?

रूको नही देखो नही
कभी पलट कर
अपना काम किया करो
बिना किसी रूकावट के

तुम तो हो ही देखने के लिये
खुद को
यही बहुत है जिन्दगी के लिये
खुशी के लिये

हां ! अकेला ही सही
अकेला आदमी
आदमी नही होता क्या ?
-----------------शिव शम्भु शर्मा ।


Monday, 18 February 2013

जीवन दूत


नीम का पेड ( अघोरी पर एक लेख देखकर )
**************
रेलवे के उस हाल्ट पर
धूल धुसरित नीम का वह पेड
साधनारत
हिलता लचकता मुस्काता खडा है

यात्रियों को छाह देता
मुंह धोनें के लिये दातून देता
हवाओ को शुद्ध करता रहता
गिलहरियों पक्षियों चीटियों
कभी दुत्कारता नही
अपना फ़ल देता है
जीवन देता है

किसी से अपना गम नही कहता
न मांगता है न उलाहने देता
और न श्राप देता

कितना शांत अविकल खडा है
वह प्यारा नीम


उस धूनी रमाये अधोरी से बहुत उंचा है
जो गालियां बकता मांस खाता
पेशाब पीता रहता है
केवल अपने मोक्ष के लिये

पेड अधोरियों की तरह
स्वात:सुखाय नही होते
नही चाहते
नही साधते
केवल अपने लिये किसी
कुत्सित इच्छित कामनाओं का जखीरा

हंसते झूमते रहते  पुरी कायनात
के प्रेम मे मगन
जीवन दूत
मुझे उस नीम के पेड से प्यार है ।
-----------शिव शम्भु शर्मा ।


Saturday, 16 February 2013

एक समय मर रहा है


आलोचक जब भी कविता लिखते है
संभल कर लिखते है

उनका
बनावटी
सजावटी पन

फ़िसल जाता है तब
बूढे साहित्यविदों
की पैनी पुरानी पड चुकी चश्में के नजर की धार से

एक समय मर रहा है
कभी नही लौटने के लिये

मुझे अब भी  इंतजार है
उनके बोलने का
जो सवाल नही करते
मुस्कुराकर चुप रहते है ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Friday, 15 February 2013

हवा


गिला नही
शिकवा नही किसी से
मुझे माफ़ कर देना मेरे भाइ
आदमी नही अब हवा हूं
किसी
रिसतें नश्तर की दवा हूं
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

Thursday, 14 February 2013

श्रीमान जी


श्रीमान जी
***************
कोई भाट चारण बंदी या मसखरा नही हूं मै
बरफ़ का तेल नही बेचता मै
शब्दो के बिंब से
चमत्कारी तिलिस्म बनाकर
बाजार सजाकर
पुडियां नही बेचता  मै
मुझे माफ़ कीजिये श्रीमान जी ॥
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।

नया सवेरा


नया सवेरा
***************
एक मंच से लाउड स्पीकर से कुछ आवाजें आती है
कोई बडा आदमी बोल रहा है शायद
मेरे पांव अनायास चले जाते है
उस मंच की परीधि में

मै ध्यान से
खडा सुनता रह जाता हूं उन्हें
वे बोलते जाते है
उदाहरण देकर समझाते जाते है

और चले जाते है किसी दुसरे मंच की ओर
अभी आता हूं कहकर

मै खडा रह जाता हूं वही
प्रतीक्षा रत
और फ़िर हो जाता है
नया सवेरा ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।

रेगिस्तान



***************
एक बरस से
हर रोज दो चार घंटे
एक रेगिस्तान की रेत में गद्ढा खोद रहा हूं
इस उम्मीद और आस के साथ
कि इस रेत के अंदर आखिर क्या है ?

पहले कभी यहां समुद्र था
तो आखिर कहां चला गया  इसका  इसका पानी ?

कही तेल तो नही बन गया ?
और छिप तो नही गया सदा के लिये
किसी बैसाल्ट की चट्टान की परत के नीचे ?

मैदानी इलाकों में इतनी मेहनत से आ गया होता अब तक पानी
यह जानता हूं यहां तो सभी खोद लेगे
पर इस मरे रेगिस्तान का क्या करूं?
जो रहस्य बना चिढाता रहता है मुझे
मेरे लिये अभी  भी यह एक चुनौती है


अभी तक अपने कद से ज्यादा नही खोद पाया हूं
हर दुसरे दिन यह गड्ढा मुझे भरा मिलता है
रेत की निगोडी आंधियां मुझे हरा देना चाहती है
मेरे किये पर फ़ेर देती है पानी


मुझे जुटाने होगे  वैसे उपकरण जो खोद सके एक अदद गद्ढा
छेद सके कठोर चट्टानो को

और यहां कोई है भी नही मेरे सिवा
जिसे पुकार कर बुला सकु
और पता लगा सकु उस स्रोत का
मेरे भीतर के उस कौतुहल का
जिज्ञासा  का

मैदानो में खोदना कठिन है और प्राप्य आसान
इस रेगिस्तान में खोदना आसान है और प्राप्य कठिन

मै अकेला ही सही
पर मै हारा नही हूं अब तक
खोजकर ही रहूंगा

सहारा कालाहारी जैसे इस मरू देश के थार का रहस्य
लिखुंगा और
खुद पढुंगा
और  करूगा हस्तांक्षर
एक दिन यही
इसी जगह ॥
--------------------शिव शम्भु शर्मा ।



आज यह फ़ेसबुक पर यह पढने को मिला ,.. वासना रहित निस्वार्थ प्रेम श्री कृष्ण (ईश्वर) है आराधना शब्द का "राध्य" प्रतिरूप स्वयं राधा है ।


आज यह फ़ेसबुक पर यह पढने को मिला ,..
वासना रहित निस्वार्थ प्रेम श्री कृष्ण (ईश्वर) है
आराधना शब्द का "राध्य" प्रतिरूप स्वयं राधा है ।
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आखिर प्रेम में ऎसा क्या छिपा हुआ है
जो यह  ईश्वर है  ?

फ़िर ऎसा क्यों होता है कि
पुरूष स्त्री से
स्त्री पुरूष से ही केवल क्यो प्रेम किया करते है
क्या प्रेम करने के लिये और कोई दुसरा प्राणी नही मिलता ?
और  फ़िर प्रेम विवाह भी करते है ??

प्रेम अगर वासना रहित है
निस्वार्थ है

तो ऎसा क्यो नही होता कि
पुरूष अथवा स्त्री एक दुसरे से प्रेम / विवाह  नही करके
किसी पेड या किसी लाजवंती पौधे से प्रेम करते हो ?
और उनसे ही विवाह भी करते हो ?

क्या यह सही नही है कि प्रेम भी एक वासना है ?
(जबकि वासना एक व्यापक शब्द है )

वासना मे स्वार्थ है
स्वार्थ में आनंद है
और आनंद में तृप्ति है ??
और आनंदपूर्ण तृप्ति ही प्रेम की आधारशिला है

क्या यह सही नही है कि यही प्रेम की  बुनियाद है
और इसी बुनियाद पर खडा है विश्व और ईश्वर ??

अगर यह बुनियाद सही नही हो तो  फ़िर यह सृष्टि ही नही चलेगी
फ़िर बचेगा क्या ?
फ़िर प्रेम क्या ?
नफ़रत क्या ?
श्री कृष्ण क्या ?
और राधा क्या ?
फ़िर कुछ भी तो बचेगा ही नही   मेरे बंधुओं ??

हो सकता है मै गलत कहता होऊ
फ़िर आप बताए कि सही क्या है ?
-------------------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 12 February 2013

वाकपटु



**********************
वाकपटु श्री वाचाल जी चाहते थे
कि हम उनकी हर बात मे जी--हुजुरी करते रहे
मित्र शब्द  का अर्थ-- उनकी नजर मे " चाटुकार " था

उनकी हाँ में हाँ मिलाकर
जो बनाये रखता हो  उन्हे साहित्यकार
और करता रहता हो सदा  उनकी जय जयकार

हमारे  स्वतंत्र उन्मुक्त साम्य विचारो का स्वाभिमान
उनके उपर उठने मे रोडा था शायद

खुदा करे वे  और भी
उठ जाए जमीन की सतह से उपर
ये दुआ है हमारी

हमारा क्या है
हम जमीन की ठोकर है
जन मजुर और नौकर है
हो जाएगा हमारा कही भी गुजर बसर ।
                  --------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Tuesday, 5 February 2013

शोक


तुम नही जानते दुख क्या होता है
और क्या होता है शोक
कितना अंतर है दोनो में
तुम नही समझ सकते

कितनी मोटी लकीर से अलग अलग है दोनो
दुखों पर मुस्कुराना आसान हो भी जाए शायद
पर शोक पर मुस्कुराना एक पागलपन ही होगा
या फ़िर होगी कोइ ज्ञान की चरम अवस्था

शोक सालता ही नही
मार डालता है
शब्द बिला जाता है तब

शोक एक उंची लहरों की तरह आता है
और अपने साथ
लेकर चला जाता है सबकुछ
कोई निशान तक भी नही छोडता
तुम नही समझ सकते

सारी कविताए कहानियां संगीत और ढांढस भी
तब पास नही फ़टकते
बचा रह जाता है बस एक मौन
अनंत को निहारती केवल दो फ़टी उदास आंखे

और रह जाती है एक चिर प्रतीक्षा जिसे
वक्त के सिवा कोइ दुसरा नही
समझ सकता
और न
समझा सकता है
यह तुम नही समझ सकते ॥
----------------शिव शम्भु शर्मा ।

पता नही वह कौन है ?


पता नही वह कौन है ?
**********************************************
ऎसा  नही है कि यह बडा जहाज अब डुबने से  बच जाए
सवार मैं भी हूं इस पर
एक बछडे की त्वचा के खोल में भरे भुसें की मानिंद खडा देखता

मर तो मैं उस दिन ही गया
जिस दिन इस जहाज पर धकेल  कर लाया गया था
अपने ही लोगो द्वारा जबरन  घसीट घसीट कर

जहाज के कानून के मुताबिक
धर्म संप्रदाय और जाति के विरूद्ध
बोलने और चलने के संगीन अपराध के   इलजाम पर

झाडु और पोछें की अहमियत एक ऎसी हिकारत है
जिसमें आदमी का होना    नही होना
एक बडे पर जहाज पर कोइ मायनें नही रखता

पानी में डुबी हुई उत्ताल लहरों के फ़व्वारों के कोहरों में छिपी
मुझे सामने दिख रही है बहुत  कडी -- कडी कट्टर पथरीली हत्यारी चट्टानें

मेरी आंखे खुली हुई है
और पुतलियों की तंग गलियों में एक फ़टी चटाई पर बस थोडी सी  चेतना जिन्दा है
मुंह पर पट्टियां बंधी हुई है
और पुरा देह जंजीरों से जकडा हुआ है
जहाज के मस्तुल पर के झंडे के नीचे
बेजुबान

हेली पैड से लैस
रडार और सोनार की केबिन में एक ताला लगा हुआ है

यात्री और कर्मचारियों का हुजुम  क्रुज की नृत्यांगना के नृत्य के बैंड की थाप पर मदहोश हैं
कौन कितना बेहतर नाचता है उनमें इस बात की होड है

एक दुसरे की टांग में लंगडी फ़साकर उसे गिरा देना और उसकी लाश पर नाचना
यहां प्रथम पुरस्कार माना जाता है

जहाज के मालिकाना कब्जें में साझेदारी और
जीतनें  वाले को सोने और हीरों से जडा मुकुट बतौर पुरस्कार दिया जाता  है

इस बात से बेखबर कि जहाज किस राह पर और  किधर चला जा रहा है

जिनके कांधे पर जहाज की जिम्मेवारी है
वे अपने अपने स्वर्ग समेटे गुटों में बंटे केबिनों में  अलग अलग थिरक रहे हैं

खाली बोतलों की तरह
लुढक चुके बेहोश कप्तान को  मै देख पा रहा हूं
बडे बडे हवा भरें ट्युब  छोटी नावें और हेलिकाप्टर रहने के बावजूद
मेरे सामनें फ़िर एक बार एक टाईटेनिक डुबने वाला है

मैं एक बेजुबान निरूपाय बंदी हूं
मेरी आंखो का मीठा पानी  इस खारें समुद्र मे अर्थहीन है
जहाज के साथ-साथ डुबना तय है मेरा भी

और मै यह  जानता हूं कि मेरा यह देखना समझना किसी काम का नही है
फ़िर भी पता नही वह कौन है ?
जो मेरे कान मे आकर चुपके से कहता है कि

एक जहाज के डुबने से पुरी सभ्यता समाप्त नही होती
फ़िर कोई न कोई जन्म लेगा गलत को गलत कहने की हिम्मत लिये

और यह भी कहेगा --
कि ऎसी बेहोशी और मदहोशियों से भरे लोगों का
देश देश नही रहता वह
समाप्त हो जाता है
हमेशा हमेशा के लिये ॥
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ॥

Sunday, 3 February 2013

अदृष्य


कभी
वे भी हमारी तरह थे
महत्व उनका
उनलोगो ने  बढा दिया
जो उनकी ही तरह थे
हत्यारें

सोने के कटोरे की तलें की धूल
नही दिखती कभी
हवा की तरह रहती है
अदृष्य
-------शिव शम्भु शर्मा ।

Saturday, 2 February 2013

केचुए पर एक कथिका



केचुए पर एक कथिका  लिखना पडा 
**********************

केचुए हैं हम 
तर मिट्टी में मुँह छिपायें
बारीश के तेज कटाव पर
बहते है 
तर बतर

सरकतें है जमीन पर 
दर बदर

कभी हमारी भी थी रीढ 
हमारे पुरखें ऋषि दधीचि के गोतियें थे
दान मे दे दी थी उन्होनें
सपोलों को
सपोलें उसी रीढ से
सांप बने

अब वही सरसरातें है
और हम 
सरकते है
उचक उचक कर
चींटियाँ हमें चाट जाती हैं

एक ढेंर सारी खंभों वाली इमारत की 
मुंडेर पर चढे
चुनें मे पुतें कौवे
मुस्कुराते हैं
हमें देख कर
और हम गड जाते है
मिट्टी में दुबारा 
बारीश के नही आने की दुआ करतें ।
---------------------शिव शम्भु शर्मा ॥