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Sunday, 6 October 2013

मेरा वजूद


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इस घूमती दुनियाँ में चक्कर लगाते -लगाते
घूमते -घूमते
तुम्हारी कविता थककर जहाँ खत्म होती है
मेरे दोस्त !
ठीक वही से शुरु होती है मेरी कविता
और मेरे संग होता है मेरा अकेलापन

दूर दूर तक पसरा यह अंतहीन बियावान
निर्वातमय  अरण्य

न कोइ संगी न साथी
और न कोई ईश्वर

जहाँ अकेला भटकता रहता हूँ मैं
उस अर्थ की खोज के तहों में
जहाँ निरूत्तर हो जाता है समय
और बंद हो जाती है घडी

सामने होता है वही सन्नाटा
वही घनघोर असीम अंधेरा
जहाँ दौलत शोहरत किस्मत जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नही होता

मेरे पास बस मेरी
प्रकृति प्रद्त्त चेतना है
प्रेम है
जो तुम्हारे पास भी है

वही रह--रह कर सालती है
साथ-साथ चलती है
और जानती है मेरा होने के वजूद का अर्थ
और इसीलिये बार-बार लिखकर
जान बूझ कर
मिटा कर फ़ेंक देती है
मेरे होने का सबूत ।
----------शिव शम्भु शर्मा ।

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