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Thursday, 25 April 2013

हम ही क्यो आंसु बहाए


बेगानी शादियों में दीवानें
इस देश में अबदुल्लें बहुत है

रोज चींखती है  यहां औरतें
इस देश में छल्लें बहुत हैं

रोज लुटती है यहां अस्मतें
इस देश में मुछल्लें बहुत हैं

रोज बिकती हैं  यहां बेबशें
इस देश में दल्लें बहुत हैं

हर साल घुस आता है चीन
इस देश में गुरिल्लें बहुत है

मंत्रियों को फ़ुर्सत कहां कि देखे
इस देश में लालुलल्लें बहुत हैं

रोज मरतें हैं यहां कई भूखें
इस देश में (अनाजों के) गल्लें बहुत हैं

लिखते रहें है लिखनेवाले लिखें
इस देश में चोरों के वल्ले-वल्ले बहुत है

खाने को रोटी नही न तन पर कपडें
इस देश में क्रिकेट कें निठल्ले बहुत है

हम ही क्यो आंसु बहाए और रोए

यारो चलो हम भी मस्त रहे
इस देश में रसगुल्लें बहुत है ।
-----------------------शिव शम्भु शर्मा ।



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