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Friday, 5 April 2013

भूख


समुद्र तट पर नंगे पांव चल रहा हूं
मेरे चप्पल और कमीज मुझसे भूखें नंगों ने छीन लिये है
धूप तेज है मेरे पांव जल रहे है
उससे तेज भूख से मेरा पेट जल रहा है

सैलानियों की भारी उमडी भीड है इस धूप में भी
लोग-बाग अपने-अपने परिवारों के साथ
लहरों का मज़ा लूट रहे है
कहकहों का अट्टहास गूंज रहा है
तश्वीर वाले कैमरा लिये घूम रहे है
रेहडियों की दुकानों वाले
खोमचें वाले हांके लगा रहे है
खासा जमघट है यहां
सबके तल में एक भूख है

रेत की कलाकृतियां बना रखा है एक गरीब कलाकार ने
अपनी भूख के लिये यही दुनियां है उसके लिये यहां की

रेत की तरह यहां बिखरी चमकती है असंख्य कविताएं
इनमें  कोई भी ऎसी कविता नही है जिससे मिट सके मेरी भूख

मछुआरे भी अभी तक नही लौटे शायद निगल चुका है उन्हे परसों का उग्र समुद्र
अब और चला  जाता नही इस रेत पर
नही किया जाता और  इंतजार उन मछुवारों का मछलियों का
जिनकी ढुलाई की एवज में मेरी भूख मिटती है

इससे पहले कि कोई बडी सी लहर मुझे निगल ले हमेशा हमेशा के लिये
मुझे कही दूर निकल जाना चाहिए
मुझे तलाश है एक ऎसी दुनियां की जहां भूख नही होती
इंतजार नही होता और कोई भुखा नही होता ।
------------------शिव शम्भु शर्मा ।

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